पिछले महीने दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले में
था। वहाँ किसी साहित्यिक चर्चा में व्यंग की चुनौतियों पर विमर्श हो रहा था। मुझे
भी अपने विचार रखने का अवसर मिला। व्यंग की तमाम चुनौतियों के बीच जो सबसे बड़ी
चुनौती मुझे नज़र आती है वह है उसके कटाक्ष के प्रति सहिष्णुता या सहनशीलता की कमी।
व्यंग चुभता है, चोट करता है, और उसी चोट में उसकी सार्थकता है। मगर यदि व्यंग की
चोट से तिलमिला कर पाठक व्यंगकार की कलम ही पकड़ने और तोड़ने लगे तो व्यंग का औचित्य
ही समाप्त हो जाता है। शार्ली ऐब्डो हमले जैसी शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ
व्यंग के लिए चुनौती ही नहीं बल्कि खतरा बनकर भी उभरी हैं। उस चर्चा में मैंने
इन्हीं चुनौतियों और खतरों पर पश्चिमी विश्व के दृष्टिकोण से अपनी बातें कही थीं।
पिछले लगभग दो दशकों से ब्रिटेन में रहने की वजह
से मैं ब्रिटिश या पश्चिमी हास्य-व्यंग से भली-भांति परिचित हूँ। पश्चिमी और
विशेषकर ब्रिटिश व्यंग लघु और तीक्ष्ण होता है। बहुत कम शब्दों में वह गहरी चोट
करता है, और कभी-कभी तो बिना शब्दों के ही। ब्रिटिश व्यंग की इस विशेषता और उसके गहन
प्रभाव का सबसे अच्छा उदाहरण मिलता है वर्ष 1858 में छपे उस कार्टून में जिसका
शीर्षक था, ‘ए डिज़ाइन फॉर ए फ्रेस्को इन द न्यू हाउसेस ऑफ़ पार्लियामेंट’ (नई संसद में
लगने वाले भित्तिचित्र के लिए एक डिज़ाइन’)।
वर्ष 1858 का ब्रिटेन के इतिहास में एक ख़ास स्थान है। इस वर्ष में लंदन की थेम्स
नदी का पानी इतना अधिक प्रदूषित हो गया था कि उसकी दुर्गन्ध के चलते ब्रिटिश
सांसदों का थेम्स के किनारे बने वेस्टमिन्स्टर पैलेस में स्थित ब्रिटिश संसद में
बैठना दूभर हो गया था और शासन ने संसद को वहाँ से स्थानांतरित कर थेम्स नदी से
कहीं दूर ले जाने का निर्णय किया था। ब्रिटेन के इतिहास में इस दौर को ‘द ग्रेट
स्टिंक’ यानि कि ‘भीषण दुर्गन्ध’ का नाम दिया गया है। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति
के चलते थेम्स नदी का प्रदूषण इतना बढ़ गया था कि न सिर्फ उसकी दुर्गन्ध असहनीय थी
बल्कि इस प्रदूषण से फैली हैजा और डिप्थीरिया जैसी बीमारियों से लन्दन शहर में ही
हज़ारों जानें जा चुकी थीं।
खैर ऊपर जिस कार्टून का ज़िक्र किया गया है उसपर
आगे बात करने से पहले एक दिलचस्प बात जान लेना ज़रूरी है कि जिस तरह हम भारतीय अपनी
पवित्र नदियों को मातातुल्य मानकर उन्हें माँ की संज्ञा देते हैं, ब्रिटेन में
थेम्स नदी को पितातुल्य माना जाता है और उसे फादर थेम्स या पापा थेम्स कहा जाता है।
प्रकृति से व्यक्तिगत और आध्यात्मिक सम्बन्ध जोड़ने की परम्परा सिर्फ भारत में ही
नहीं बल्कि विश्व की हर पुरातन संस्कृति में रही है। प्राचीन मिस्र के मिथिकों में
नील नदी के सम्बन्ध कई देवी-देवताओं से जुड़े हुए हैं जिनमें एक सम्मोहन और माया की
देवी आइसिस भी है (इस आइसिस देवी का इस्लामिक स्टेट से कोई सम्बन्ध नहीं है)।
ब्रिटेन में भी थेम्स नदी को ऑक्सफ़ोर्ड के पास आइसिस के नाम से जाना जाता है।
मान्यता है कि नदी का नारी या देवी स्वरुप आइसिस आगे जाकर नर या देव स्वरुप फादर
थेम्स से मिलता है। इस मायने में इस पुरातन धारणा और हमारे भारतीय साँख्य के पुरुष
और प्रकृति के दर्शन के बीच साम्य देखा जा सकता है।
अब चलिए वापस कार्टून पर आते हैं। इस कार्टून
में फादर थेम्स को एक बूढ़े, भद्दे और जर्जर व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है जो अपने
तीन बच्चों हैजा, डिप्थीरिया और स्क्रोफुला (उन दिनों इन तीनों बीमारियों को दूषित
पानी से पैदा होने वाली बीमारियाँ समझा जाता था) को ‘फेयर सिटी ऑफ़ लन्दन’ जिसे एक
गोरी खूबसूरत मुकुटधारी महिला के रूप में दर्शाया गया है, को सौंपते हुए नज़र आते
हैं। कार्टून पर गौर करें तो पाएँगे कि एक ही स्केच में उस वक्त की उन समस्त
परिस्थितियों को उकेर दिया गया था जो थेम्स के प्रदूषण और उससे पैदा होने वाली बीमारियों
के लिए ज़िम्मेदार थीं। उस मानसिकता को नग्न कर दिया गया था जो हज़ारों मौतों की
ज़िम्मेदार होकर भी अपने स्वार्थों से उबर नहीं पा रही थी। इस कार्टून में गोरी,
स्वच्छ और मुकुटधारी महिला उस धनी और अभिजात्य वर्ग की प्रतीक थी जो प्रदूषण और बीमारियों
के शिकार निम्नवर्ग और उनके सरोकारों से पूरी तरह कटा हुआ था। वह उस उच्च वर्ग के
द्वारा नियंत्रित राजनैतिक व्यवस्था की प्रतीक थी जिसकी रूचि जनता से अधिक जनता के
प्रतिनिधियों की सुविधा में थी। इस कार्टून में बूढ़े, भद्दे और जर्जर फादर थेम्स जनता
के उन सरोकारों के प्रतीक थे जिन्हें अभिजात्य वर्ग और उनके द्वारा नियंत्रित
व्यवस्था ने इस रुग्ण अवस्था में पहुँचा दिया था। इस कार्टून में फेयर सिटी ऑफ़
लन्दन, बूढ़े, जर्जर और रुग्ण फादर थेम्स को जिस हिकारत से देखती दिखाई देती है
उसने ब्रिटेन के जनमानस पर ऐसी गहरी चोट की कि पूरा समाज उद्वेलित हो उठा। उसके
बाद तो ऐसे कार्टूनों के एक पूरी श्रृंखला ही चल निकली। पितातुल्य फादर थेम्स की
इस जर्जर और रुग्ण अवस्था के अनेक चित्रण ने पूरे समाज को ऐसा शर्मसार किया कि न
सिर्फ ब्रिटेन की संसद को फ़ौरन ही थेम्स को
स्वच्छ करने का बिल बना कर पास करना पड़ा बल्कि थेम्स की स्वच्छता और
सौन्दर्य स्थापित करने की वह मुहिम छेड़ी जिसने एक ऐसी जनक्रांति का स्वरुप ले लिया
जिसने अभिजात्य वर्ग और सामान्य वर्ग के बीच की खाई को भी काफी हद तक पाटा।
दिल्ली पुस्तक मेले की उस चर्चा में मैंने इसी
उदहारण से ये विचार रखे थे कि व्यंग में वह शक्ति है जो गहरी चोट कर जनमानस को
झकझोर सकती है, उद्वेलित कर सकती है, भावनाओं का सैलाब उठा सकती है, एक जनक्रांति
पैदा कर सकती है। परन्तु इन दिनों जिस तरह हमारी भावनाएँ छोटी छोटी बातों पर आहत
होने लगी हैं, जिस तरह व्यंगकारों और कार्टूनिस्टों पर हमले हो रहे हैं, वे व्यंग
ही नहीं बल्कि हमारे पूरे समाज के लिए खतरा हैं। क्या आज हममें से कोई कलाकार अपने
किसी आराध्य को जर्जर, रुग्ण अवस्था में हिकारत से देखा जाता हुआ दिखा सकता है?
क्या ऐसा करके वह सामान्य जनमानस के आक्रोश से बच सकता है? व्यंग तो होता ही वही
है जो चोट करे, यदि भावनाएँ छोटी-छोटी चोटों से आहात होने लगें तो व्यंग का औचित्य
ही कहाँ बच रह जाता है।
