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Sunday, 4 September 2016

हौब्सन-जौब्सन


कुछ साल पहले ब्रिटेन की जिस आईटी कंपनी के लिए मैं काम किया करता था उसने एक क्विज़ प्रतियोगिता का आयोजन किया. प्रतियोगिता में ब्रिटेन और भारत से जुड़े सामान्य ज्ञान के प्रश्न पूछे जाने वाले थे. मैंने भी उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया यह सोच कर कि एक भारतीय होने के नाते कम से कम भारत से जुड़े प्रश्नों के उत्तर तो मुझे पता ही होंगे. प्रतियोगिता में एक बड़ा आसान सा प्रश्न पूछा गया, "अंग्रेजी के 'फॉरेन' शब्द को हिंदी में क्या कहते हैं"

इस मौके को भला मैं कैसे छोड़ सकता था. तुरंत ही बज़र दबाते हुए मैंने कहा, "विदेश".

मगर प्रश्नकर्ता के चेहरे के भावों से ऐसा लगा मानो वह मेरे उत्तर से संतुष्ट न हो. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. भला मेरा उत्तर गलत कैसे हो सकता है? यकीनन फॉरेन को हिंदी में विदेश ही कहते हैं. कहीं क्विज़ मास्टर ने अमरीश पुरी पर फिल्माए गीत 'आई लव माय इंडिया..' को देख कर प्रश्न का उत्तर 'परदेस' तो नहीं सोच लिया?

इससे पहले कि मैं कोई तकरार करता क्विज मास्टर ने मुझे बताया कि जिस उत्तर की उसे अपेक्षा थी वह था, 'विलायत'.

'धत्त तेरे की', उसके बाद कुछ वक्त मुझे उसे हिंदी और उर्दू के बीच के फ़र्क को समझाने और विलायत शब्द के अरबी मूल की जानकारी देने में बीता. मगर तटस्थ होकर सोचने पर मुझे लगा कि वह कुछ गलत भी नहीं था. आज भी अँगरेज़ तो यही जानते हैं कि हम हिन्दुस्तानी इंग्लैंड को विलायत और अंग्रेजों को विलायती कहते हैं. भारत पर अंग्रेजी राज के दौरान भारत में रहने वाले अँगरेज़ खुद इसी शब्द का इस्तेमाल किया करते थे और इंग्लैंड को विलायत और खुद को विलायती कहते थे. जब कोई अँगरेज़ भारत से इंग्लैंड आने वाला होता तो वह कहता, "आई ऍम गोइंग बैक टू विलायत"

यही विलायत अंग्रेजी उच्चारण में बिगड़ कर 'ब्लाईटी' हो गया और इंग्लैंड के लिए इस्तेमाल किये जाने वाला एक पॉपुलर स्लैंग बन गया. आज भी जब कोई अँगरेज़ विदेश घूम कर वापस इंग्लैंड लौटता है तो कहता है, "ग्लैड टू बी बैक टू ब्लाईटी"

अंग्रेजी राज के शुरुआती दौर में अँगरेज़ भारत और भारतीयता से बड़े प्रभावित थे. भारतीय संस्कृति की चमक-दमक उन्हें बेहद लुभाती थी. इसी चमक-दमक के असर में वे बड़ी आतुरता से भारतीयता अपनाने लगे थे. हिन्दुस्तानी शब्द उनकी ज़ुबान पर चढ़े रहते. मगर अंग्रेजी उच्चारण के असर में वे थोड़े बिगड़ भी जाते, जैसे कि शरबत सोर्बेट हो गया और बरामदा वरांडा हो गया. ऐसे ढेरों शब्द अंग्रेजों की ज़ुबान पर चढ़ कर अंग्रेज़ी ज़ुबान का हिस्सा होते गए.

सन 1872 में दो ब्रिटिश व्यक्तियों ने ऐसे तमाम हिन्दुस्तानी शब्दों और मुहावरों का एक शब्दकोश बनाना शुरू किया. कर्नल हेनरी यूल और ए सी बर्नेल भारत में अंग्रेजी सरकार के मुलाजिम थे. हेनरी यूल की फ़ारसी और अरबी साहित्य में खासी दिलचस्पी थी और बर्नेल एक भाषाविद और संस्कृत के विद्वान् थे. शब्दकोश इस मामले में ख़ास है कि उसमें सिर्फ शब्दों के अर्थ और उनकी व्युत्पत्ति की जानकारी ही नहीं बल्कि उन शब्दों के साहित्यिक उपयोग के ढेरों उल्लेख भी हैं. इस शब्दकोश को नाम भी बड़ा मज़ेदार सा दिया गया, हौब्सन-जौब्सन. हौब्सन-जौब्सन खुद इस तरह का हिन्दुस्तानी से लिया हुआ एक शब्द है जिसका अंग्रेजी में अर्थ होता है, उत्सव या मनोरंजन. मज़ेदार बात यह कि हौब्सन-जौब्सन शिया मुस्लिम पर्व मुहर्रम पर किये जाने वाले विलाप 'या हसन, या हुसैन' का अपभ्रंश है. कहते हैं कि इस शब्दकोश के संकलन के दौरान हेनरी यूल ने मुहर्रम के एक जलसे में कुछ अँगरेज़ युवकों को जो शायद धर्म परिवर्तन कर शिया मुस्लिम हो चुके थे, 'या हसन, या हुसैन' का विलाप करते सुना जो उन्हें हौब्सन-जौब्सन सुनाई पड़ा. उन्हें यह 'हौब्सन-जौब्सन' उनके शब्दकोश के लिए बड़ा ही मुफीद नाम लगा क्योंकि यह नाम उनके शब्दकोश के चरित्र से बिल्कुल मेल खाता था, विचित्र और अनूठा.

शब्दकोश के प्रकाशन के तुरंत बाद ही हौब्सन-जौब्सन इस किस्म के शब्दों के लिए एक विशेषण बन गया और साथ ही बना 'लॉ ऑफ़ हौब्सन-जौब्सन' या 'हौब्सन-जौब्सन का नियम', जो एक भाषा से दूसरी भाषा में लिए गए शब्दों और उनके उच्चारण में बदलाव की प्रक्रिया को परिभाषित करता है. हौब्सन-जौब्सन शब्दों का अंग्रेज़ी साहित्य में भी खूब प्रयोग हुआ है, भारतीय मूल और अंग्रेज़ी मूल के लेखकों दोनों के ही द्वारा. ब्रिटिश प्ले राइटर टॉम स्टौपर्ड के नाटक 'इंडिया इंक' में एक मज़ेदार दृश्य है जिसमें दो चरित्र फ्लोरा और नीरद के बीच अधिक से अधिक हौब्सन-जौब्सन शब्दों को एक ही वाक्य में बोलने की होड़ लगती है –

फ्लोरा – "वाईल हैविंग टिफ़िन ऑन द वरांडा ऑफ़ माय बंगलो आई स्पिल्ल्ड केजरी (खिचड़ी) ऑन माय डंगरीज़ (डेनिम की जीन्स) एंड हैड टू गो टू द जिमखाना इन माय पजामाज़ लूकिंग लाइक ए कुली"

नीरद – "आई वास बाइंग चटनी इन द बाज़ार वेन ए ठग हू हैड एस्केप्ड फ्रॉम द चौकी रैन अमोक एंड किल्ड ए बॉक्सवाला फॉर हिस लूट क्रिएटिंग ए हल्लाबलू एंड लैंडिंग हिमसेल्फ इन द मलागटानी (भारतीय मसालों से बना चिकन सूप)

एक दिलचस्प बात यह भी है कि हौब्सन-जौब्सन का संकलन ब्रिटिश राज के उस विक्टोरियन युग में हुआ था जब अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर ब्रिटेन की नस्लीय और सांस्कृतिक श्रेष्ठता को स्थापित करने के संकल्पित प्रयास किये जा रहे थे. हौब्सन-जौब्सन पर भी इस नस्लीय भेदभाव का स्वाभाविक शिकार होने के आरोप लगते रहे हैं. शब्दकोश की प्रस्तावना की पहली पंक्ति ही कहती है, 'भारतीय मूल के शब्द एलिज़ाबेथ के शासन के समाप्त होने के बाद से ही अंग्रेज़ी भाषा में घुसपैठ करने के लिए लालायित रहे हैं और अंग्रेजी साहित्य में प्रवेश की प्रतीक्षा करते रहे हैं'

प्रसिद्ध लेखक नीरद सी चौधरी के शब्दों में, "हौब्सन-जौब्सन उस ब्रिटिश राज और भारत और ब्रिटेन के बीच के उस सम्बन्ध का विवरण देता है जो एक ही समय में नेक और क्षुद्र, जटिल और साधारण, निष्ठुर और दयनीय और हास्यास्पद और दुखद रहा है"

हौब्सन-जौब्सन के प्रकाशन के लगभग एक शताब्दी बाद सन 1982 में एक अन्य ब्रिटिश मूल के व्यक्ति नाइजेल हैन्किन को एक ऐसा ही शब्दकोश बनाने का विचार आया, जिसे उन्होंने हौब्सन-जौब्सन की तर्ज़ पर नाम दिया हैन्क्लिन-जैन्क्लिन. हैन्किन सन 1945 में ब्रिटिश आर्मी में कप्तान के पद पर भारत आए थे. मगर उन्हें भारत से इतना लगाव हो गया कि वे भारत की आज़ादी के बाद भी ब्रिटेन नहीं लौटे और भारत की मिटटी में ही रम गए. हैन्किन को इस शब्दकोश का विचार तब आया जब दिल्ली के ब्रिटिश उच्चायुक्त में ब्रिटेन से कुछ दिन पहले ही आए एक डॉक्टर ने उन्हें किसी भारतीय अंग्रेजी अखबार में से ऐसे बीस-पच्चीस शब्दों की सूची निकाल कर दी जिसका अर्थ उन्हें समझ नहीं आ रहा था, जैसे कि 'ईव टीज़िंग', जो खासतौर पर यौन-उत्पीड़न के लिए भारतीय उपमहाद्वीप में ही उपयोग होता है. हौब्सन-जौब्सन की तरह ही हैन्क्लिन-जैन्क्लिन भी सिर्फ एक शब्दावली ही नहीं है बल्कि उन समस्त प्रथाओं और परम्पराओं का विवरण भी है जो उन शब्दों से जुड़े हैं.

हैन्क्लिन-जैन्क्लिन विक्टोरियन युग के ठग लुटेरों के बारे में एक दिलचस्प जानकारी देता है जिनके आतंक ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. अंग्रेजी शासन द्वारा ठगों के आतंक पर लगाम मेजर-जनरल विलियम स्लीमन के प्रयासों से लगाई गई थी. ठगों के आतंक से सबसे अधिक प्रभावित मध्यभारत के जंगली इलाके में इन्हीं जनरल स्लीमन ने एक ठगी समस्या मुक्त गाँव बसाया जिसका नाम स्लीमनाबाद रखा गया. मध्यप्रदेश के कटनी शहर के पास बसे स्लीमनाबाद में आज भी मेजर स्लीमन की याद में एक ऊँचा स्मारक है. कहते हैं कि संतानविहीन मेजर स्लीमन को पास ही बसे कोहका के एक हिंदू धर्म स्थल पर औलाद की मन्नत मांगने जाना पड़ा था और अपनी मन्नत पूरी होने के बाद के बाद ही उन्होंने इस गाँव को बसाने का निर्णय किया था. दिलचस्प बात यह भी है कि मेजर स्लीमन के पोते और परपोते आज भी इस गाँव जो अब एक क़स्बा बन चुका है, से जुड़े हुए हैं और ख़ास त्योहारों पर यहाँ ज़रूर आते हैं.

हैन्क्लिन-जैन्क्लिन के पन्ने पलटते हुए आपको यह भी पता चलता है कि शब्द प्रीपोन जो कि पोस्टपोन का विपरीत है आधुनिक भारतीय अंग्रेजी की ही देन है. एक और दिलचस्प बात हैन्किन इस शब्दकोश में कहते हैं कि भारत में पैसेंजर या यात्री ट्रेन उसे कहते हैं जिसमें यात्रा करने से अधिकाँश यात्री बचना चाहते हैं. नाइजेल हैन्किन ने वर्षों भारत में एक टूरिस्ट गाइड की तरह भी काम किया है जो भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों को हिंदी के प्रचिलित शब्दों से परिचित भी कराया करते थे. एक बार उनसे पूछा गया कि भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों को हिंदी के किन शब्दों से सबसे पहले परिचित होना चाहिए तो उन्होंने कहा, सबसे पहले तो उन्हें 'चलो' शब्द सीखना चाहिए जो तंग कर रहे भिखारियों को आगे बढाने में बहुत काम आता है.

Sunday, 12 June 2016

अंग्रेज़ी मुल्क में कितना रोमांस है.


जब कभी भारत और ब्रिटेन की तुलना हो तो एक मज़ेदार बात कही जाती है, 'इन ब्रिटेन यू कैन किस इन पब्लिक बट कैन नॉट पिस इन पब्लिक, इन इंडिया यू कैन पिस इन पब्लिक बट कैन नॉट किस इन पब्लिक'. वैसे मात्र एस्थेटिक्स के स्तर पर देखा जाए तो चुम्बन का दृश्य काफ़ी मनोहर और आकषर्क होता है और सार्वजनिक स्थल पर किसी को मूत्र विसर्जित करते देखना प्रायः भद्दा ही लगता है. चुम्बन के ये मनोहर,आकर्षक और उत्तेजक दृश्य आपको ब्रिटेन में सार्वजनिक तौर पर कहीं भी देखने मिल सकते हैं. ट्रेन में, बस में, कैफ़े में, रेस्टोरेंट में, बाग़-बगीचे में या रास्ते चलते हुए सड़कों के किनारे, प्रेमी युगल अपने पारस्परिक आकर्षण का कामुक प्रदर्शन करने से परहेज़ नहीं करते. वैसे कहा जाता है कि पश्चिमी यूरोप के अन्य देशों की तुलना में ब्रिटिश कहीं अधिक संकोची और रूढ़िवादी हैं, और मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी यही कहता है, मगर तुलना यदि भारत से हो तो यौन अभिव्यक्ति के मामले में ब्रिटिश काफी अधिक उदार हैं.

भारतीय उपमहाद्वीप में यौन उन्मुक्तता को पश्चिमी देशों की देन माना जाता है. आम धारणा यही है कि यौन उन्मुक्तता पश्चिम की पहचान है और प्रेम, प्रणय या यौन प्रसंगों में संकोच और लज्जा भारतीयता का परिचय है. कम से कम हिन्दुत्ववादी संगठनों के कर्णधार तो यही मानते और मनवाना चाहते हैं. सन 1968 में आई हिंदी फिल्म औलाद में मेहमूद और अरुणा ईरानी पर फिल्माया यह गीत भी कुछ ऐसा ही कहता है, "जोड़ी हमारी जमेगा कैसे जानी, हम लड़का अंग्रेज़ी तुम लड़की हिंदुस्तानी". इस गीत की दो पंक्तियाँ है, "अंग्रेजी मुल्क में कितना रोमांस है, बाहर का छोकरी कितना एडवांस है".

मगर यदि छह या सात दशक पीछे जाएं तो पाएंगे कि मामला कुछ अलग ही था और अंग्रेज़ी मुल्क का छोकरी इतना एडवांस भी नहीं होता था. 1951 में ब्रिटेन के दक्षिण-पूर्वी समुद्र तटीय शहर क्लैटोन-ऑन-सी में हुए एक 'पर्सनालिटी गर्ल ऑफ़ द वीक' प्रतियोगिता की विजेता से उसके जीवन की महत्वाकांक्षा पूछी गई तो उसने गर्व से मगर कुछ लजाते हुए उत्तर दिया, "मेरे जीवन की महत्वाकांक्षा पहले ही पूरी हो चुकी है, विवाह के रूप में". उसके यह कहते ही दर्शकों के बीच से तालियों का ऐसा शोर उभरा जैसे उसने यह कह कर पूरे राष्ट्र को गौरान्वित किया हो.

पचास के दशक का ब्रिटेन आज के भारत की तरह ही पारिवारिक मूल्यों वाला समाज था. एक सुयोग्य वर ढूंढ़ कर उसके साथ विवाह के पवित्र बंधन में बंध जाना, बस यही किसी पुत्री से उसके माता-पिता की सबसे बड़ी अपेक्षा होती. ससुराल और पति की अपेक्षा भी यही होती कि वह दो चार प्यारे बच्चे पैदा कर वंश का नाम आगे बढ़ाए, घर संभाले और परिवार में रम जाए. महिलाओं की व्यावसायिक महत्वाकांक्षाएं बहुत मायने न रखती और तलाक़ या पुनर्विवाह बुरे समझे जाते. रोमांस यूँ माहौल में बिखरा न होता और यौन या प्रणय प्रसंग बहुधा बंद दरवाज़ों के पीछे ही होते. और जिस बात पर समाज और धर्मगुरुओं की सबसे अधिक गाज गिरती वह थे विवाहेतर संबंध. पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति समर्पण और बच्चों की अच्छी परवरिश ही पारिवारिक मूल्यों की आधारशिला होती. और यदि दुर्भाग्यवश पति का किसी अन्य स्त्री से सम्बन्ध हो तो पत्नी बीवी नंबर वन की तरह स्वयं को यही दिलासा देती, मन मत हार, कुछ दिनों में वह वापस लौट ही आएगा. परिवार और मित्र भी उसे यही सलाह देते, 'कुछ नए कपड़े खरीदो, बालों को घुंघराले करो और खुद को अधिक आकर्षक बनाओ. पति जब रीझेगा, तभी ठहरेगा.'

यदि सेक्स के मामले में ब्रिटिश औरतें संयमी थीं तो मर्द भी काफी संकोची थे. ब्रिटिश मर्दों के इस संकोची स्वभाव को पचास और साठ के दशक के प्रसिद्ध कॉमिक आर्टिस्ट बेनी हिल अपने प्रदर्शनों में बखूबी दिखाते। उनके प्रदर्शनों में इस तरह के मज़ेदार दृश्य होते जिसमें ब्रिटिश पुरुष महिलाओं को तिरछी नज़रों से चोरी-छुपे ताकते मगर जैसे ही कोई महिला उनके करीब आती तो वे शरमा या घबराकर भाग खड़े होते। कुल मिलाकर यौन उन्मुक्तता का जो स्वरुप आज हम ब्रिटेन में देखते हैं वह तब न था, और सेक्स एक ऐसा शब्द था जिसकी चर्चा पर ब्रिटिश उतने ही असहज थे जितने कि आज रूढ़िवादी भारतीय होते हैं.

मगर सेक्स के प्रति इस संकोची नज़रिये का नकारात्मक पहलू था यौन अज्ञान और वह अज्ञान किसी कहावत के अनुरूप ब्लिस या आनंद न होकर पीड़ादायक ही था. अनचाहे गर्भ ठहरते और अनचाहे बच्चे भी पैदा होते. और यदि ऐसा विवाह के पवित्र बंधन के बाहर हो तो वह और भी कष्टकर या पीड़ादायक होता. 1982 में प्रकाशित ब्रिटिश लेखिका शर्ली कॉनरेन का बहुचर्चित और बेहद लोकप्रिय उपन्यास 'लेस' यही दर्शाता है कि साठ के दशक में किसी स्त्री का कुंवारी माँ के रूप स्वीकारा जाना कितना कठिन था. कहानी चार युवा और अविवाहित सखियों की है जिनमें एक गर्भधारण कर लेती है. उस सखी को सामाजिक प्रकोप से बचाने के लिए चारों सहेलियां पैदा होने वाली बच्ची की माता का नाम गुप्त रख कर उसकी मिलजुल कर परिवरिश करने का निर्णय लेती हैं. और फिर बाकी की कहानी उस बच्ची का बड़े होकर अपनी असली माँ को ढूंढने की कवायद है. 'व्हिच वन ऑफ़ यू बिचेस इस माय मदर?', बच्ची द्वारा युवा होकर अपनी माताओं से पूछा गया यह प्रश्न न सिर्फ अविवाहित माँ की पीड़ा बल्कि अनचाहे बच्चे की मानसिक वेदना को भी बखूबी पेश करता है.

लेस की कहानी से प्रेरित एक हिंदी फिल्म भी बनी थी, शाहरुख़ खान और दिव्या भारती द्वारा अभिनीत और हेमामालिनी द्वारा निर्देशित, 'दिल आशना है'. एक फिल्म के रूप में ‘दिल आशना है’ बहुत अधिक सफल नहीं हुई, मगर अस्सी के दशक में उपन्यास लेस एक ऐसा फिनामन बन गया था जैसा कि आज 'फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे' है. उपन्यास सामाजिक बंधनों से बंधी युवा महिलाओं की छटपटाहट तो दर्शाता ही है मगर साथ ही परोसता है गर्मागरम यौन प्रसंगों के दृश्य भी. 'लेस इस द बुक दैट एवरी मदर केप्ट हिडन फ्रॉम हर डॉटर', पुस्तक परिचय साफ़-साफ़ शब्दों में कहता है, मगर सच यह भी है कि यह पुस्तक युवतियों या किशोरियों से छुप न पाई और हाई स्कूल या कॉलेज जाने वाली हर किशोरी इसे किसी न किसी रूप में हासिल कर ही लेती। कहा जाता था कि यदि कोई किशोरी किसी अन्य किशोरी को भूरे लिफ़ाफ़े में बंद कोई चीज़ चुपके से दे रही हो तो वह लेस की प्रति ही होगी।

लेस साठ और सत्तर के दशक के यौन उन्मुक्तता और नारी स्वतंत्रता के लिए छटपटाते समाज की कहानी कहता है. साठ, सत्तर और अस्सी के दशक पश्चिम में यौन क्रांति के दशक थे. ये वे दशक थे जब महिलाओं ने अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए पारिवारिक ज़िम्मेदारियों से समझौता करना या उनका त्याग करना आरम्भ कर दिया. ये वे दशक थे जब उन्होंने अपनी यौन आकांक्षाओं को खुल कर व्यक्त करना शुरू किया. ये वे दशक थे जब सेक्स शब्द से सार्वजनिक परहेज़ होना कम हुआ. ये वे दशक थे जब सेक्स को वंश बढ़ाने की क्रिया के रूप से निकल कर यौन आनंद के मूल स्वरुप में स्वीकार किया गया. आज का भारत भी इसी तरह की किसी यौन क्रांति से गुज़रता दिखाई देता है. आश्चर्य न होगा यदि आने वाले दशकों में 'यू कैन किस इन पब्लिक' भारत में भी वैसा ही स्वीकार्य हो जैसा कि आज ब्रिटेन में है.

संगीत या शोर


लन्दन से बर्मिंघम आए हुए कुछ दिन ही हुए थे। बर्मिंघम में मेरे एक अंग्रेज़ साथी एडम भारतीय संगीत में थोड़ी बहुत रुचि रखते थे। पण्डित रविशंकर को उन्होने सुन रखा था। आशा जी के कुछ एल्बम भी उन्होने सुने थे। एक दिन बातचीत में मैने उनसे उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का ज़िक्र किया। मैने उनसे कहा कि आप ज़ाकिर हुसैन को ज़रूर सुने, यकीनन आप कह उठेंगे, 'वाह उस्ताद'। कुछ दिनों बाद ही उनका जन्मदिन था। मैंने सोचा कि उन्हें भेंट में उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का एक सीडी दिया जाए। बर्मिंघम शहर में एक इलाका है, स्पार्कहिल। हालांकि वहाँ न तो कोई स्पार्क है और न ही कोई हिल। यदि कुछ है तो दक्षिण एशियाई मूल के निवासियों की बड़ी तादाद, मूलतः पाकिस्तानी मूल के लोगों की। सुन रखा था कि भारतीय फिल्मों और भारतीय संगीत का क्रेज़ भारतीयों से अधिक पाकिस्तानियों में है। सो सीडी की तलाश में मैं स्पार्कहिल पहुंचा। मिठाइयों, कपड़ों और जेवरात की दुकानों की कतार में एक बड़ी सी म्यूज़िक शॉप भी दिखाई दी, नाम था 'म्युज़िक महल' या ऐसा ही कुछ। दुकान के भीतर जाकर मैंने रिसेप्शन पर खड़े नौजवान से कहा, "उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के कुछ सीडी दिखाएँ"
नौजवान ने शायद ज़ाकिर हुसैन का नाम न सुन रखा था। उसने एक और नौजवान को आवाज़ लगाई। दूसरे नौजवान ने आते ही कहा, "ज़ाकिर हुसैन! नाम तो सुन रखा है, क्या गाता है? ग़ज़ल या क़व्वाली?"
मैं बिना कुछ कहे ही दुकान से बाहर निकल आया। कुछ दूरी पर एक और दुकान थी, 'संगीत'। वहाँ मुझे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति बैठे हुए दिखाई दिए। मुझे लगा उन्हें तो अवश्य भारतीय शास्त्रीय वादकों के बारे में ज्ञान होगा।
"ज़ाकिर हुसैन को कौन सुनता है यहाँ। यह तो रैप और भांगड़ा सुनने वालों की जमात है। मेहदी हसन साहब का यह सीडी एक साल से पड़ा है, आज तक नहीं बिका, हाँ दलेर मेहँदी दर्जनों बिक जाते हैं" ब्रिटेन की दक्षिण एशियाई मूल की नौजवान पीढ़ी से उन्होंने कुछ इस तरह मेरा परिचय कराया।
संगीत का मेरा ज्ञान बड़ा दुर्बल है। वह जिसे 'वॉन गॉफस इअर्स फॉर म्यूज़िक' कहते हैं, वैसा ही कुछ हाल है मेरे कानों का भी संगीत के मामले में, 'तान बधिर'। मगर मुझे इतना समझ आता है कि अच्छा संगीत वह होता है जो आत्मा को झंकृत कर दे, और अच्छा होने के लिए उसका शास्त्रीय होना अनिवार्य नहीं है। वैसे भी कला के लिए कोई पाबंदियां नहीं होनी चाहियें। कला पाबंदियों से परे होनी चाहिए। कुछ वर्षों पहले उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान को एक टीवी शो पर देख रहा था। उनसे प्रश्न किया गया कि क्या एक अच्छा गायक होने के लिए शास्त्रीय संगीत का ज्ञान आवश्यक है, तो उन्होंने बड़े सरल शब्दों में कहा, संगीत को शास्त्रीय, सुगम, पॉप, रॉक आदि में बांट कर उससे बड़ा अन्याय हो रहा है, संगीत तो बस वह है जो रूह को सुकून दे, और जो रूह को बेचैन कर दे वह संगीत नहीं शोर है।
रूह को सुकून देने वाला, आत्मा को झंकृत करने वाला या 'सोल अपलिफ्टिंग' संगीत भारतीय संगीत परम्परा की पहचान रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' में लिखा है, "भारतीय कला में एक आध्यात्मिक प्रेरणा निहित है, एक अतेन्द्रीय दृष्टि। भारतीय कला में सौंदर्य आत्मनिष्ठ है, वस्तुनिष्ठ नहीं। वह आत्मा का सौंदर्य है, जो भारतीय कला के मनोहर रूप में प्रकट होता है"
भारतीय कला की यह आध्यात्मिक प्रेरणा पश्चिमी कला को निरंतर प्रभावित करती रही है। पचास, साठ और सत्तर के दशक भारतीय या पूर्वी अध्यात्म के पश्चिम में लोकप्रिय रूप या पॉपुलर फॉर्म लेने के दशक थे। कई प्रसिद्ध पश्चिमी वैज्ञानिक क्वांटम फिज़िक्स और पूर्वी अध्यात्म के बीच समानता ढूंढते और सामानांतर खींचते नज़र आए। नोबल पुरुस्कार विजेता ऑस्ट्रियन वैज्ञानिक एरविन श्रोडेंगर भारतीय अध्यात्म से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने वेदांत को अपना जीवन दर्शन बना लिया और अंतिम सांस तक वेदांत के अनुयायी रहे। पूर्वी अध्यात्म के इस प्रभाव ने न्यू ऐज मूवमेंट को जन्म दिया जिससे न्यू ऐज साइंस की उत्पत्ति हुई। न्यू ऐज मूवमेंट से ही प्रभावित थी हिप्पियों की पीढ़ी जो आल्टर्ड स्टेट ऑफ़ कॉन्शियसनेस को अनुभव करने के लिए नशीली दवाओं का प्रयोग करती। हिप्पी शब्द हिप से बना है, जिसका अर्थ होता है चैतन्य या जागरूक। अब यह तो नशीली दवाओं के सेवक या प्रयोगी ही जानें कि उनका सेवन किस तरह की जागरूकता लाता है।
हिप्पी पूर्वी अध्यात्म के प्रेम और शांति के दर्शन का प्रचार करते परन्तु उनके दर्शन में निठ्ठल्लेपन, मदमस्ती और संयम रहित उन्मुक्तता की मौजूदगी कहीं न कहीं भारतीय दर्शन से मेल न खाती। हिप्पी मूवमेंट में एक सशक्त ऊर्जा फूंकी हिप्पी म्यूज़िक ने। हिप्पियों का संगीत उन्मुक्त संगीत होता उनके दर्शन की ही भांति। सन 1967 में हिप्पी मूवमेंट से जुड़ा प्रसिद्द ब्रिटिश रॉक बैंड 'द बीटल्स'। द बीटल्स के लीड गिटारिस्ट जॉर्ज हैरिसन भारतीय शास्त्रीय संगीत के मुरीद थे। कहते हैं कि किसी फिल्म की शूटिंग में सेट पर सितार का उपयोग किसी प्रॉप के रूप में किया गया था। शूटिंग के बाद जॉर्ज हैरिसन ने सितार उठा कर उसके तार छेड़ने शुरू किये। सितार के तारों ने उन्हें ऐसा जकड़ा कि वे पण्डित रविशंकर के शिष्य और भारतीय संगीत के साधक हो गए। भारतीय संगीत के साथ ही जॉर्ज भारतीय दर्शन और भारतीय अध्यात्म के रंग में भी रंग गए और हरे कृष्णा मूवमेंट का हिस्सा हो गए। जॉर्ज हैरिसन के साथ ही हिप्पियों की फ़ौज भी हरे कृष्णा मूवमेंट से जुडी और अमेरिका के सेन फ़्रांसिस्को से लेकर लन्दन की सडकों तक 'हरे रामा हरे कृष्णा' की धुन पर झूमती फिरी।
बीटल्स का संगीत और उसके गीतों के बोल अध्यात्म के रस में भीगे लगते। जॉर्ज हैरिसन के ही प्रभाव ने रॉक संगीत की एक नई विधा को जन्म दिया, 'रागा रॉक'। सत्तर के दशक में रागा रॉक की परंपरा को आगे बढ़ाया ब्रिटिश गिटारिस्ट जॉन मेकलॉफिन और उनके बैंड शक्ति ने। जॉन मेकलॉफिन ने जाज़ से प्रभावित रागा रॉक का एक नया प्रारूप तैयार किया। सत्तर के दशक के अंत में शक्ति बैंड बिखर गया। लगभग बीस साल की चुप्पी के बाद 1997 में जॉन मेकलॉफिन ने उस्ताद ज़ाकिर हुसैन के साथ मिलकर एक नया बैंड बनाया 'रेमेबेरिंग शक्ति', जिसमें शंकर महादेवन, यू श्रीनिवास और वी सेल्वागणेश ने शामिल होकर उसे एक पंचक का रूप दिया। प्रसिद्ध बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया भी इस बैंड से कुछ समय तक जुड़े रहे।
नब्बे के ही दशक में एक अन्य ब्रिटिश रॉक बैंड 'कार्नरशॉप' ने भारतीय संगीत और भारतीय वाद्यों जैसे सितार और ढोलकी को अपने संगीत में मिलाना शुरू किया। किसी समय ब्रिटेन में पूर्वी अफ्रीका से आए अधिकांश भारतीय जिनमें गुजरातियों की बहुलता थी, आजीविका के लिए छोटी-छोटी डेली नीड्स की कार्नरशॉप चलाया करते थे। इन कार्नरशॉप की खासियत यह थी यदि आधीरात को भी किसी सामान की ज़रुरत हो तो ग्राहक दुकान के दरवाज़े की घंटी बजाते और ऊपर के कमरे में सो रहा दुकानदार उठ कर उन्हें सामान दे देता। शाम के पांच बजे ही दुकान का शटर गिराने वाले अंग्रेज़ों के बाज़ार में ये कार्नरशॉप बड़ी लोकप्रिय हुईं और एक तरीके से ब्रिटेन में भारतीयों की पहचान ही बन गईं। खैर 1997 में कॉर्नरशॉप ने आशा भोंसले को समर्पित गीत बनाया 'ब्रिमफुल ऑफ़ आशा' जो न सिर्फ बेहद हिट हुआ बल्कि यूके चार्ट में पहली पायदान तक पहुँच गया। भारतीय संगीत, अध्यात्म और हिप्पी दर्शन से ही प्रभावित एक अन्य ब्रिटिश बैंड कुला शेकर भी नब्बे के दशक से लेकर आज तक काफी लोकप्रिय रहा है। कुला शेकर के लोकप्रिय गीत 'तत्व' और 'गोविंदा' के तो बोल भी संस्कृत के हैं।
रागा रॉक की परंपरा ब्रिटेन में आज भी जारी है. मगर जिस पॉपुलर म्यूजिक ने ब्रिटेन की नौजवान भारतीय पीढ़ी को जकड रखा है वह वाही संगीत है जिसका ज़िक्र संगीत शॉप में बैठे बुज़ुर्ग व्यक्ति कर रहे थे। वह संगीत है हिप-हॉप से प्रभावित भारतीय संगीत। रैप और भागड़ा के फ्यूज़न का संगीत। जे शॉन और यो यो हनी सिंग का संगीत। रागा रॉक के आध्यात्मिक प्रारूप के विपरीत यह म्यूज़िक भौतिकता के प्रतीकों से लदा हुआ है, कॅश, कार, हीरे, ज़ेवरात और ख़ूबसूरत युवतियों के जिस्मों का प्रदर्शन करता संगीत जिसे सुना कम और देखा अधिक जाता है। क्या ऐसा संगीत रूह को छू सकने की क्षमता रखता है? ऐसे संगीत को उस्ताद ग़ुलाम मुस्तफ़ा खान क्या कहना पसंद करेंगे, संगीत या शोर?

डू यू बिलीव इन घोस्ट्स?


"डू यू बिलीव इन घोस्ट्स?" मेरी सहकर्मी एंजेला ने मुझसे पूछा।
"वाय?" मुझे उसके इस आकस्मिक प्रश्न पर थोड़ा आश्चर्य हुआ। अचानक यह भूत-प्रेतों का प्रसंग कहाँ से निकल आया।
"घोस्ट होते हैं" पास बैठे एक अन्य सहकर्मी स्टीव ने कहा।
अब तो मेरा आश्चर्य और भी बढ़ा। अंग्रेज़ों के बारे में मेरी धारणा यही थी कि वे वैज्ञानिक मानसिकता के लोग होते हैं और भूत-प्रेत जैसी अवैज्ञानिक बातों में विश्वास नहीं करते।
"आपने भूत देखे हैं?" मैने आश्चर्य से स्टीव से पूछा।
"भूत दिखते नहीं पर वे होते हैं" स्टीव ने आत्मविश्वास से कहा, जैसे भूतों से उसका गहरा सम्बंध हो।
"जब आपने भूत देखे नहीं तो आपको कैसे पता कि वे होते हैं?"
"भूत महसूस होते हैं"
"किस तरह?"
"आप उन्हें सेन्स कर सकते हैं, सुन सकते हैं, स्मेल भी कर सकते हैं। हम हर रात अपना टीवी बंद करके सोते हैं, मगर कभी-कभी रात को टीवी अपने-आप चालू हो जाता है। मुझे लगता है कि रात को प्रेतात्माएँ हमारे घर आकर टीवी देखती हैं"
मेरी हंसी छूटते-छूटते रुकी। मेरा मन किया कि स्टीव से प्रश्न करूं कि जो दिखते नहीं वे देखते कैसे हैं। फिर मुझे लगा कि आस्था के संसार में तर्कों की घुसपैठ वैचारिक मुठभेड़ को ही आमंत्रण देती है। बस यही सोच कर मैने इस प्रश्न को होठों पर आने से पहले ही रोक लिया।
"अचानक यह भूत-प्रेतों का प्रसंग कैसे?" स्टीव को नज़रअंदाज़ करते हुए मैने एंजेला से पूछा।
"अगले हफ़्ते हैलोवीन है। इसी उपलक्ष्य में इस सनडे हम लंदन के घोस्ट टूर पर जा रहे हैं" एंजेला की नीली आँखें चमक उठीं।
"घोस्ट टूर?" एंजेला और स्टीव दोनो ही मुझे लगातार आश्चर्य के झटके दे रहे थे।
"तुम्हे शायद नहीं पता कि लंदन विश्व का सबसे अधिक हौंटेड (भुतहा) शहर है। यहाँ के भूत-प्रेतों से जुड़े खौफनाक किस्से बड़े मशहूर हैं। इन्हीं किस्सों का अनुभव कराने के लिये घोस्ट टूर होते हैं, जिनमें ऐसी हौंटेड जगहों पर ले जाया जाता है जहां कहते हैं कि अब भी प्रेतात्माएँ बसती हैं" एंजेला ने स्पष्ट किया। इसी बीच मैने गौर किया कि स्टीव के चेहरे पर एक दर्प भरी मुस्कान तैर रही थी, जैसे कह रही हो, "देखा! मैने कहा था ना"
"अच्छा! क्या ये टूर डरावने होते हैं? क्या टूर के दौरान भूत वाकई महसूस होते हैं?" मेरी उत्सुकता बढ़ी।
"जिन्हें भूत-प्रेतों में विश्वास है उन्हें ज़रूर महसूस होते हैं" एंजेला ने स्टीव पर शरारती नज़र डालते हुए कहा।
एंजेला और स्टीव से हुए इस संवाद ने लंदन शहर के प्रेतात्माओं के भयावह किस्सों के प्रति मुझमें काफी उत्सुकता पैदा कर दी। कहते हैं कि प्रेतात्माएँ अक्सर उन्हीं जगहों पर होती हैं जिन जगहों ने या तो बहुत अधिक पीड़ा देखी है या बहुत अधिक प्रसन्नता। लंदन शहर ने दोनों को ही बहुत गौर से देखा है। लंदन का इतिहास बहुत ही रोचक है। एक ओर यदि मध्ययुगीन इतिहास क्रूरता से आहत और रक्त से सना हुआ है तो आधुनिक इतिहास उपलब्धियों से भरपूर है। शायद इसीलिये भूत-प्रेतों के विशेषज्ञ और लंदन में हौंटेड टूर का आयोजन करने वाले रिचर्ड जोन्स का कहना है कि लंदन में मृतकों के चर्चे जीवितों से अधिक होते हैं।
लंदन का मध्यकालीन इतिहास निर्दयता और नृशंसता के किस्सों से अटा पड़ा है। मध्ययुग में अपराधियों और राजद्रोहियों के लिये एक आम सज़ा होती थी, उनका सिर कलम कर शूल की नोक पर लगा कर सरेआम उनका प्रदर्शन करना। कहते हैं कि किसी समय थेम्स नदी पर बने लंदन ब्रिज के किनारों पर लगे शूल इन नरमुण्डों से सजे होते थे। कुछ वर्षों पूर्व लंदन ब्रिज के पास 'लंदन ब्रिज एक्सपीरियेन्स' नामक आकर्षण का निर्माण करते हुए श्रमिकों को एक ऐसी व्यापक कब्रगाह मिली जो नर-कंकालों और नरमुण्डों से भरी पड़ी थी। इनमें से बहुत से शीश वाकई शूलों से भेदे हुए थे। इस कब्रगाह से वे श्रमिक ऐसे भयभीत हुए कि उन्होने वहां अकेले या रात में काम करने से ही मना कर दिया। आज भी 'लंदन ब्रिज एक्सपीरियेन्स' में बने आकर्षण 'लंदन टूंब्स' या 'लंदन मकबरों' में कर्मचारी अकेले काम करने से डरते हैं। कहते हैं कि शाम को जब कर्मचारी घर लौट जाते हैं तो प्रेतात्माएँ कब्रों से निकल कर मक़बरों के अहातों में घूमती हैं। इसकी सत्यता परखने के लिये एक जांचदल भेजा गया जिसे वहां रात को अकेली घूमती एक महिला दिखी। जांचदल ने सोचा कि वह रात को देर तक रुकी कोई महिला कर्मचारी होगी, मगर जांच करने पर पाया गया कि उस दिन वहां कोई महिला कर्मचारी काम पर थी ही नहीं। लंदन टूंब्स के कर्मचारी इस महिला को एमिली नाम से जानते हैं और कहा जाता है कि वह वहां कई बार देखी गई है।
लंदन की सबसे भुतहा इमारत है, 'टावर ऑफ लंदन'। अपने नौ सौ साल के इतिहास में इसने कई षड्यंत्र, हत्याएं और अपराधियों और राजद्रोहियों के कटे हुए सिर देखे हैं। छह बार विवाहित ब्रिटिश सम्राट हेनरी अष्टम ने यहीं अपनी दो पत्नियों एन बोलिन और कैथरीन हॉवर्ड के सिर व्यभिचार के आरोप में कलम कराए थे। कहते हैं कि एन बोलिन का सिर कटा प्रेत आज भी टावर में मंडराता रहता है जबकि कैथरीन की चीखें उस कमरे से आती सुनी जाती हैं जहां उसे मृत्युदंड से पहले कैद रखा गया था। सन 1864 में एक पहरेदार ने एक सफेद साया टावर में मंडराता देखा। उसने अपनी संगीन उठाते हुए साये को ललकारा। साया अचानक उसके बिल्कुल करीब आ गया। पहरेदार ने साये को अपनी संगीन से भेदना चाहा। मगर वह पूर्णतः अचंभित रह गया जब उसने देखा कि संगीन किसी हाड़-मांस से न टकरा कर साये के पार निकल गई। इस अचम्भे से घबराकर वह वहीं बेहोश होकर गिर गया। उसे बेहोशी की हालत में पाने वाले उसके कमान अधिकारी को लगा कि वह शराब के नशे में चूर होकर गिरा पड़ा था। अपने काम की उपेक्षा करने के आरोप में पहरेदार का कोर्ट मार्शल हुआ मगर दो प्रत्यक्षदर्शियों की इस गवाही ने उसे बचा लिया कि उन्होने उसे एन बोलिन के सिर कटे प्रेत से भयभीत होकर गिरते देखा था।
टावर ऑफ लंदन के भीतर मंडराती प्रेतात्माओं के किस्से अनेक हैं। इसी तरह एक बार एक अन्य पहरेदार रात की गश्त पूरी करने के बाद थोड़ी देर सुस्ताने बैठा। उसने अपने दायें पैर का जूता निकाल कर पैर की मालिश करनी चाही तभी उसे पीछे से एक भयावह स्वर सुनाई दिया, 'यहाँ सिर्फ मैं और तुम हैं"
पहरेदार ने झटपट पैर पर जूता वापस चढ़ाते हुए कहा, "बस यह जूता पहन लेने दो, उसके बाद यहाँ सिर्फ तुम ही रहोगे"
टॉवर ऑफ लंदन के भयावह अतीत का एक परिणाम यह भी है कि इस इमारत पर हमेशा ही कौव्वे मंडराते रहते हैं। धारणा है कि जिस दिन टॉवर पर कौव्वे मंडराना बंद कर देंगे उस दिन पूरा इंग्लॅंड ही नष्ट हो जाएगा।
प्रेतात्माओं से जुड़ा एक अन्य दिलचस्प किस्सा है काउट्स बैंक का। काउट्स लंदन के सबसे पुराने प्राइवेट बैंकों में एक है और ब्रिटेन की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय स्वयं इस बैंक की ग्राहक हैं। कुछ सालों पहले बैंक के एक कंप्यूटर रूम में किसी प्रेत द्वारा उपद्रव मचाने की खबर उड़ी। बैंक के भीतर विचित्र घटनाएं होने लगी थीं। बत्तियाँ अपने आप बंद और चालू हो जातीं और अक्सर एक साया भी मंडराता दिखता। किसी महिला ने एक सिर कटा प्रेत देखने की भी बात कही। बैंक के निदेशकों ने एडी बर्क्स नामक किसी तांत्रिक को प्रेत भगाने के लिये बुलाया। एडी ने प्रेत से संपर्क साधते हुए पता लगाया कि वह नॉरफोक के चौथे ड्यूक थॉमस हॉवर्ड का प्रेत था जिसे महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम के विरुद्ध विद्रोह की साजिश रचने के लिये मृत्युदंड दिया गया था। एडी ने खुलासा किया कि प्रेत ने उनसे विनती की है कि जब से उसका सिर कलम कर उसे मृत्युदंड दिया गया है उसके मन में गहरी पीड़ा और आक्रोश है और वह उस पीड़ा से मुक्ति चाहता है। कुछ दिनों बाद बैंक के पास ही एक कॅथोलिक चर्च में प्रेतात्मा की मुक्ति के लिये एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया गया जिसमें नॉरफोक के वर्तमान ड्यूक को भी बुलाया गया। प्रार्थना के बाद ड्यूक से किसी प्रेस रिपोर्टर ने प्रश्न किया कि अपने पूर्वज की आत्मा की मुक्ति के बाद उन्हे कैसा महसूस हो रहा है, तो उन्होने मुस्कुराते हुए कहा, "दरअसल मैं प्रेतात्माओं में यकीन नहीं करता"
लंदन की सबसे भुतहा इमारतों में जानी जाने वाली एक अन्य इमारत है '50 बर्क्ली स्क्वेयर'। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भूत-प्रेतों के कई भयावह किस्से इस इमारत से उड़ कर दूर-दूर तक पहुंचते रहे। इमारत के आस-पास से गुज़रने वाले पथिक कई अदृश्य चीखों और खौफनाक आवाज़ों की गूंज के किस्से बयान करते। एक बार इस मकान में रह रहे परिवार ने एक नई नौकरानी रखी, जिसे रहने के लिये उपर का कमरा यानी अटारी दी गई। एक रात पूरा परिवार नौकरानी की चीखों से जाग उठा। उपर जाकर देखा तो पाया कि नौकरानी खौफज़दा आँखों से ताकती किसी लाश की तरह अकड़ी हुई कमरे के बीचों-बीच खड़ी हुई थी। दुर्भाग्यवश नौकरानी उस खौफ की कहानी कभी सुना नहीं पाई क्योंकि उसके बाद उसका मानसिक संतुलन कभी भी नहीं लौटा। इस घटना के तुरंत बाद एक दुस्साहसी युवक ने उस कमरे में एक रात बिताने का साहस जताया। उसके लिये व्यवस्था की गई कि यदि उसे किसी सहायता की ज़रूरत हुई तो वह एक घंटी बजा कर संकेत करेगा। जैसे ही वह युवक उस कमरे के भीतर गया वह घंटी ज़ोरों से बजनी शुरू हो गई। दौड़ते हुए उपर पहुंचे लोगों को कमरे में युवक की लाश मिली जिसकी आँखें चेहरे से बाहर निकलती हुई भय से छत को ताक रही थीं।
इस घटना के बाद उस मकान को खाली कर दिया गया। मगर एक रात दो खानाबदोश नाविक इस मकान में घुस आए और अटारी में सोने चले गए। थोड़ी देर बाद उनकी आँखें भारी और तेज़ कदमों की आहट से खुलीं। एक तेज़ झटके से कमरे का दरवाज़ा खुला और एक खौफनाक साया कमरे के भीतर घुसा। एक नाविक चीखता हुआ खिड़की से कूदकर कमरे से बाहर भागा और थोड़ी देर बाद एक पुलिसवाले को साथ लेकर लौटा। लौटने पर उसे अपने साथी का विक्षप्त शव सीढियों की रेलिंग पर लटका हुआ मिला।
सन 1930 के आस-पास इस मकान को दुर्लभ पुस्तकों के विक्रेता मैग्स बन्धुओं ने खरीद लिया। तब से आज तक इस मकान से किसी भूत-प्रेत या संदिग्ध मृत्यु की कोई खबर नहीं मिली है। वैसे कहा जाता है कि इन खौफनाक किस्सों के फैलने से लगभग पंद्रह-बीस वर्ष पूर्व लिखी गई प्रेतकथा 'द हौंटेड एंड द हंटर्स' की कहानी इन किस्सों से काफी मिलती-जुलती है।
लंदन के भयावह अतीत की गाथा 'जैक द रिपर' के ज़िक्र के बिना पूरी नहीं होती। 'जैक द रिपर' लंदन का एक अज्ञात सीरियल किलर था जिसने सन 1888 में लंदन के वाइट चैपल इलाके के आस-पास लगातार पांच हत्याएं की थीं। उसकी पांचों शिकार महिलाएं ही थीं। इन पांचों हत्याओं की गुत्थी न तो कभी सुलझ पाई और न ही कभी हत्यारा पहचाना या पकड़ा गया। मगर पुलिस और प्रेस को 'जैक द रिपर' नामक किसी व्यक्ति द्वारा लिखे सैकड़ों खत मिलते रहे जिनमें इन हत्याओं की जानकारी और हत्यारे को पकड़ने के सुझाव दिये होते। माना गया कि ये खत स्वयं हत्यारे द्वारा लिखे हुए थे जो एक तरह से पुलिस को चुनौती दे रहा था। इसीलिये अज्ञात हत्यारे का नाम 'जैक द रिपर' पड़ गया। वैसे कई लोगों का मानना है कि ये खत पूरे केस को सनसनीखेज बनाने के लिये किसी पत्रकार द्वारा लिखे गए थे। कहते हैं कि कुछ वर्षों बाद पुलिस ने यह दावा भी किया कि उन्होने एक ऐसे पत्रकार को खोज निकाला है जिसने यह स्वीकार किया कि उसने अपने अखबार का प्रसारण बढ़ाने के लिये ही ये खत लिखे थे।
कमर्शियल स्ट्रीट पर बने 'द टेन बेल्स' पब का 'जैक द रिपर' केस से खास नाता है। 'जैक द रिपर' की अंतिम शिकार मैरी केली 9 नवंबर 1888 की रात इस पब से निकली थी। अलगी सुबह उसका क्षत-विक्षप्त शव पब के सामने वाली सड़क पर बने उसके मकान में मिला। इस पब के मालिकों ने लोकप्रियता पाने के लिये कुछ सालों तक तो इस पब का नाम ही 'जैक द रिपर' रख दिया था। यह पब भी भुतहे पब के नाम से मशहूर है। इस पब की इमारत से भूत-प्रेतों के कई किस्से खबर में आते रहे हैं। एक बार एक तांत्रिक को इस इमारत में बसने वाले प्रेतों की खोज के लिये बुलाया गया। तांत्रिक इमारत के उपरी तले पर एक कमरे के सामने पहुंच कर रुक गई और उसने आगे जाने से मना कर दिया। उसका कहना था कि उस कमरे में कोई खौफनाक हादसा हुआ था और उसे पक्का यकीन था कि उस हादसे में किसी बच्चे की निर्मम हत्या की गई थी। कुछ सालों बाद 'जैक द रिपर' केस की एक विशेषज्ञ को पब की जांच-पड़ताल के लिये बुलाया गया। विशेषज्ञ ने छत पर बनी पानी की टंकी के पीछे एक थैला पाया जिसमें किसी बच्चे के खून से रंगे कपड़े रखे थे, जिन्हे देख कर लगता था कि उनमें से होकर कोई चाकू घोंपा गया था। यह टंकी ठीक उस कमरे के उपर थी जिसके सामने जाकर तांत्रिक ठिठक गई थी।
'जैक द रिपर' कौन था और उसका क्या हुआ यह तो कभी पता न चल सका मगर लोगों का मानना है कि 31 दिसंबर 1888 को नववर्ष की संध्या को उसने वेस्टमिन्सटर ब्रिज से थेम्स नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली थी। यदि आज भी आप 31 दिसंबर की रात वेस्टमिन्सटर ब्रिज पर खड़े हों तो रात के ठीक बारह बजे, नववर्ष शुरू होते ही आपको ब्रिज पर 'जैक द रिपर' के प्रेत का साया दिख सकता है, यदि आप भाग्यशाली हों तो।

आकर्षित करता है थेम्स का पारदर्शी प्रवाह



५ अगस्त १९९८, आज से लगभग अठारह साल पहले लन्दन शहर से मैं पहली बार रूबरू हुआ था. ब्रिटेन की जिस आईटी कम्पनी के लिये मैं दिल्ली में काम किया करता था उसे मेरी सेवाओं की लन्दन में ज़रूरत आ पड़ी थी. दिल्ली के इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरकर, पेरिस होते हुए एयरफ्राँस की फ्लाइट समय पर लन्दन पहुंच चुकी थी. दोपहर के लगभग दो बजे होंगे. फ्लाइट में मिले बेज़ायकेदार खाने से मुंह का स्वाद बिगड़ा हुआ था और मूड भी कुछ खराब था. आदत के अनुसार एक जोड़ी बनारसी पान की तलब हो रही थी. हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरते ही सबसे पहले मेरा ध्यान आकर्षित किया कम या तंग कपड़ों में बेतकल्लुफ़ी से सौन्दर्य परोसती युवतियों ने. जितना सौन्दर्य उनके अंगों से छलक रहा था उतना ही उनकी गालों तक खिंची मोहक मुस्कानों से भी. सब की सब लगता था किसी प्रोफेशनल इन्स्टिट्यूट से मुस्कुराने की ट्रेनिंग लेकर आई थीं. भारतीय युवतियाँ अपरिचित युवकों की ओर देखकर मुस्कुराने से अक्सर परहेज़ करती हैं कि कहीं कोई किसी गलतफहमी का शिकार ना हो जाए. अंग्रेज़ी बलाएँ इस मामले में बेहद उदार हैं. गलतफहमियों की परवाह भी शायद उन्हे कम ही रहती हैं. उनकी उदार मुस्कानों से मेरा मिज़ाज कुछ ठीक हुआ. बनारसी बीड़े की तलब भी जाती रही.
हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही मेरा स्वागत किया सूट-बूट और टाई में सजे एक गोरे व्यक्ति ने जो मेरे नाम की तख्ती लिये खड़ा था. उसके रंग-ढंग से मैने अनुमान लगाया कि वह हमारी कम्पनी का कोई एग्ज़िक्युटिव होगा. मेरे सामान की ट्रॉली लिये वह टॅक्सी स्टॅंड की ओर बढ़ा और वहाँ खड़ी काले रंग एक चमचमाती सी-क्लास मर्सेडीज़ का बूट खोल कर उसमें मेरा सामान रखा. टॅक्सी के दाईं ओर का पिछला दरवाज़ा खोल कर उसने बड़े आदर से मुझे अंदर बैठने का आग्रह किया. तब जाकर मुझे समझ आया कि वह एक टॅक्सी ड्राइवर था जिसे हमारी कम्पनी ने मुझे लेने भेजा था. मैने उससे कहा कि मैं सामने की ओर पॅसेंजर सीट पर बैठना पसंद करूंगा. वैसे मर्सेडीस में बैठने का असली मज़ा तो तब है जब आप ड्राइवर सीट पर हों. खैर ड्राइवर सीट न सही उसके बगल वाली ही सही. मारुति 800 के आदी व्यक्ति का सी-क्लास मेर्सेडीज़ में पहली बार बैठने पर शायद वही हाल होता है जो दुर्योधन का पांडवों के इन्द्रप्रस्थ के महल में जाकर हुआ था. सौभाग्य से वहाँ मेरा मज़ाक उड़ाने के लिये कोई द्रौपदी मौजूद नहीं थी.
मुझे लिये टॅक्सी सेंट्रल लन्दन के हौलबोर्न इलाके की ओर बढ़ चली जहां मेरे रहने का इंतज़ाम किया गया था. लन्दन के बारे में मेरी कल्पना थी नमी में लिपटा सांवला आकाश और उससे ढकी गगनचुंबी इमारतें. मेरी कल्पना के विपरीत आकाश साफ़ और उजला था और गगनचुंबी इमारतें नदारत थीं. लन्दन का ट्रैफिक सुव्यवस्थित था. सुव्यवस्थित चीज़ों के बारे में कुछ अधिक कहने को नहीं होता. सब कुछ बस एक सा, एक ही रफ़्तार से चलता रहता है, मानो कहीं कोई एक्साइटमेंट ही न हो। लन्दन के ट्रैफिक का भी वही हाल था. सड़कों के किनारे बने मकान भी लगभग एक से थे और दुकानें भी लगभग एक सी. वही कतार में लगीं एक दूसरे से लगभग सटी दो मंज़िला इमारतें, वही किनारों की ओर ढलकी लाल खप्परों या टाइलों से ढकी छतें, वही छतों से सिर उठाती लाल ईंटों से बनी छोटी-छोटी चिमनियाँ और उन पर बैठे कबूतर. पहली नज़र में लन्दन शहर ने मुझे बेहद निराश किया. मगर जैसे-जैसे हम सेंट्रल लन्दन की ओर बढ़ने लगे शहर का स्वरूप कुछ-कुछ बदलने लगा. विक्टोरियन शैली से लेकर जॉर्जियन, ट्यूडर, गॉथिक, नॉर्मन और एंग्लोसेक्सन होते हुए, रोमन शैली तक के आर्किटेक्चर का सुन्दर मिश्रण दिखाई देने लगा, और साथ ही दिखाई देने लगीं आधुनिक शैली में बनी कुछ गगनचुम्बी इमारतें भी. ऐसा लगा जैसे मेरी निराशा से आहत लन्दन पूरे सामर्थ्य के साथ अपने सौन्दर्य को अनावृत करने पर उतारू था.
थोड़ी देर बाद ही मेरा सामना हुआ उस नदी से जिसकी धारा से कहीं अधिक उसके किनारे जीवंत और गतिशील दिखाई पड़ रहे थे. जी हाँ थेम्स नदी. यूँ तो फ्लाइट के लन्दन में उतरते समय हवाईजहाज की खिड़की से मुझे नागिन की तरह बल खाती थेम्स के दर्शन पहले ही हो चुके थे, मगर किनारों तक लबालब भरी इस नदी को पास से देखने का आनंद कुछ और ही था. खूबसूरत टॉवर ब्रिज के नीचे से लगभग पारदर्शी जल की धारा लिये बहती थेम्स और दिल्ली के निज़ामुद्दीन ब्रिज के नीचे किसी नाले की नियति लिये बहती यमुना नदी के बीच तुलना का विचार मन में तैर आया, जिसे मैने बड़ी मुश्किल से एक ओर सरकाया. तुलना के लायक कोई विशेष समानता मुझे दिखाई न दी सिवाय इसके कि दोनो ही नदियाँ अपने किनारों पर एक लम्बा और महत्वपूर्ण इतिहास लिये बहती हैं. वैसे थेम्स का प्रवाह हमेशा ही ऐसा पारदर्शी न हुआ करता था. कहते हैं कि थेम्स का पानी कभी काफी मटमैला और गहरे धूसर रंग का हुआ करता था. थेम्स के बहुत से हिस्सों में समुद्र की तरह ही ज्वार-भाटे से उठा करते हैं, जो तह की मिट्टी को उपर उठा लाते हैं और पानी की उपरी सतह तक को मटमैला कर देते हैं. यदि इस पानी को साफ़ न किया जाए और उस पर आस-पास की गंदगी और प्रदूषण उसमें उसी तरह आकर मिलते रहें जैसे कि भारत की शहरी नदियों में आकर मिलते रहते हैं तो पानी काफी गहरे रंग का हो सकता है. माना जाता है कि नदी का नाम थेम्स इसके गहरे रंग की वजह से ही पड़ा था. संस्कृत का शब्द 'तमस' जिसका अर्थ हिन्दी में ‘अंधकार’ और अंग्रेज़ी में ‘डार्क’ होता है, वह लेटिन में 'टेमेसिस' और केल्टिक में 'टेमेसस' होते हुए 'टेम्स' हो गया. कुछ शताब्दियों बाद यूनानी असर में टेम्स को थेम्स कहा जाने लगा. यानि कि कहा जा सकता है कि थेम्स नदी को उसका नाम एक तरह से भारत की ही देन है. एक धारणा यह भी है कि लेटिन शब्द ‘टेमेसिस’ दो शब्दों से मिलकर बना है, 'टॅम' अर्थात चौड़ा और 'आइसिस' अर्थात पानी या नदी, यानि कि टेमेसिस का अर्थ हुआ 'चौड़ी नदी'. हालांकि भारतीय नदियों गंगा, यमुना या ब्रह्मपुत्र से तुलना की जाए तो थेम्स किसी दृष्टिकोण से चौड़ी नदी नहीं लगती.
ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद थेम्स पर औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण का वैसा ही असर पड़ा जैसा कि भारत की शहरी नदियों पर इन दिनों देखने मिलता है. सन १८५८ में थेम्स का पानी इतना प्रदूषित और बदबूदार हो गया कि इस दुर्गन्ध के मारे उसके तट पर बनी ब्रिटिश संसद में सांसदों का बैठना दूभर हो गया और ब्रिटिश संसद को कुछ दिनों के लिये स्थगित करना पड़ा. किसी भी राष्‍ट्रीय समस्या का असर जब राजनीतिज्ञों या सांसदों पर पड़े तो उसका हल भी तुरंत ही निकल आता है. ब्रिटिश संसद ने भी तुरंत ही थेम्स के प्रदूषण को दूर करने की सीवर योजना का बिल १८ दिनों के भीतर बना कर पारित भी कर डाला. लन्दन का सीवर सिस्टम विश्व के सर्वाधिक सक्षम सीवर सिस्टम में एक है. शहर की आबादी और प्रदूषण बढ़ने के साथ ही इस सीवर सिस्टम का विस्तार और आधुनिकीकरण भी होता रहा है. कुछ महीनों पहले ही मैं एक ऐसे ही एक्सपांशन प्रोजेक्ट के आईटी डिज़ाइन और आर्किटेक्चर पर थेम्स वाटर कंपनी के लिए काम कर रहा था. चार बिलियन पॉउण्ड यानि कि लगभग चार हज़ार करोड़ रुपए का यह प्रोजेक्ट थेम्स की धारा के सौंदर्य को और निखारने की एक महत्वकांक्षी योजना है. यदि इतिहास में कभी एक बदबूदार नाले का रूप ले चुकी थेम्स आज पानी की एक स्वच्छ और पारदर्शी धारा लिए बह सकती है तो भारत की पवित्र नदियों गंगा और यमुना का इससे अलग किसी और नियति को प्राप्त होना राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से ही है.
हॉलबोर्न में ठहरने के बाद मैं रोज़ शाम को थेम्स के किनारे लम्बी सैर पर निकल पड़ता. कभी पश्चिम में वेस्टमिंस्टर ब्रिज की ओर तो कभी पूर्व में टॉवर ब्रिज की ओर. एक ओर थेम्स की धारा से उठती ठंडी हवा और दूसरी ओर उसके किनारों पर बनी ऐतिहासिक इमारतों का सौंदर्य, जिनमें लम्बवत्त गॉथिक शैली में बना खूबसूरत ‘वेस्टमिन्स्टर पैलेस’ और ताजमहल जैसा गुंबद लिए बना अनूठा ‘सेंट पॉल कैथेड्रल’ जैसी बेमिसाल इमारतें शामिल हैं, हर शाम की यह पैदल सैर मुझे थेम्स के किनारों के जैसी ही सजीवता से भर देती. पूर्व की ओर बढ़ते हुए दूर से ही टॉवर ब्रिज का सौंदर्य मन मोह लेता, खासतौर पर तब जब उसके नीचे से कोई बड़ी बोट गुज़र रही होती. टॉवर ब्रिज कोलकाता के हावड़ा ब्रिज की तरह एक केंटिलीवर ब्रिज है. जब भी उसके नीचे से किसी बड़ी बोट को गुज़रना हो तो ब्रिज के केंटिलीवर उस पर से गुजरने वाले सारे यातायात को रोक कर, ऊपर की ओर उठ जाते हैं. इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद करने के लिए ढेरों पर्यटक लम्बे समय तक टॉवर ब्रिज के आसपास खड़े इस अवसर का इंतज़ार करते रहते हैं.
बहुत से लोग आज भी टॉवर ब्रिज को गलती से लन्दन ब्रिज कहते हैं जबकि लन्दन ब्रिज उससे कुछ दूरी पर बना एक अलग ब्रिज है. लन्दन ब्रिज का भी एक अनूठा इतिहास है. यह ब्रिज इतिहास में कई बार बना, टूटा और फिर बना है. संभवतः सबसे पहला ब्रिज रोमन आक्रमणकारियों ने बनाया था जो लकड़ी का बना प्लावी या फ्लोटिंग ब्रिज था. ब्रिटिश सम्राट हेनरी द्वितीय ने सन ११७६ में पहला पक्का ब्रिज बनवाया और उसे अपने मित्र और राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी केंटबरी के आर्चबिशप थॉमस अबेकेट को समर्पित करते हुए ब्रिज पर उसकी याद में एक चैपल भी बनवाया. समय के साथ ब्रिज के दोनों ओर ढेरों अन्य इमारतें बनाई गई जिनमें से कुछ सात मंज़िलों तक ऊँची थीं और ब्रिज के दोनों ओर लगभग सात फुट तक बाहर लटकी हुई थीं. समय-समय पर ये इमारतें आग लगने या अन्य दुर्घटनाओं का शिकार होकर ढहती रहीं और फिर बनती रहीं. प्रसिद्द बालगीत 'लन्दन ब्रिज इस फॉलिंग डाउन … ' इन्हीं टूट और मरम्मतों की कहानी कहता है. ब्रिज के दोनों ओर बनी इमारतों की वजह से यह ब्रिज इतना संकरा हो चुका था कि इस पर से गुजरने वाला ट्रैफिक तंग भारतीय सडकों के ट्रैफिक की तरह ही अव्यवस्थित होकर थम जाता. सड़क पर बाईं ओर ड्राइव करने का नियम इसी ट्रैफिक को व्यवस्थित करने के लिए सन १७२२ में बनाया गया था. सन १८३१ इस ब्रिज को ढहा कर एक चौड़ा और मजबूत ब्रिज बनाया गया जो दुर्भाग्यवश अपने ही भार से धंसता गया. बीसवीं शताब्दी में इस ब्रिज को भी ढहा कर किसी अमेरिकी व्यवसायी को ऊँची कीमत में बेच दिया गया. कहा जाता है कि ब्रिज को खरीदते समय अमेरिकी व्यापारी को भ्रम था कि वह टॉवर ब्रिज खरीद रहा था.
थेम्स के पुलों से जुड़ा एक दुर्भाग्यजनक तथ्य यह भी है कि इन पुलों से गिरकर या कूदकर बहुत से लोग अपनी जाने भी गवाते हैं. लगभग हर हफ्ते थेम्स से एक मानव शव निकाला जाता है. हालाँकि कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि इन मृत्युओं का कारण थेम्स में रह रहे कुछ अदृश्य पोलर भालू हैं. सन १२५२ में सम्राट हेनरी तृतीय को नॉर्वे से भेंट में एक पोलर भालू मिला था जिसे वे थेम्स में मछलियाँ पकड़ने के लिए छोड़ दिया करते थे. संभवतः उस पोलर भालू के वंशज आज भी थेम्स में अदृश्य रूप से तैर रहे हैं.
जहाँ भारत में पवित्र नदियों को देवी या माततुल्य माना जाता है वहीँ ब्रिटेन में थेम्स को पितातुल्य मानकर 'फादर थेम्स' कहा जाता है. 'ओल्ड फादर थेम्स' या 'वृद्ध थेम्स देव' थेम्स नदी का मूर्तिमान रूप है जो काफी कुछ यूनानी देवता नेपच्यून की तरह दिखता है. 'ओल्ड फादर थेम्स' की लगभग नग्न मूर्ती टॉवर ब्रिज के पास, उसकी ओर ऊँगली उठा कर इशारा करती हुई टॉवर हिल पर लगी हुई है, जिसे पर्यटक अक्सर नेपच्यून की मूर्ती समझ लेते हैं.
थेम्स से जुड़े रोचक तथ्य, किस्से और मिथक अनेक हैं. आज सोलह वर्ष बाद भी थेम्स मुझे उतना ही आकर्षित और विस्मित करती है जितना उसने मुझे पहली मुलाकात में किया था. आज भी थेम्स के किनारे टहलते हुए मैं उससे जुड़े रोचक किस्से तलाशता रहता हूँ और साथ ही पढता रहता हूँ उस इतिहास को जो उसके किनारे रचा हुआ है. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'द ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री' में कहा है कि इतिहास को सिर्फ किताबों में न पढ़ो, उन्हें ऐतिहासिक इमारतों और उनके अवशेषों में भी देखो. उन्हें गौर से देखो उनमें तुम्हे इतिहास लिखा नज़र आएगा. बस कुछ ऐसी ही कोशिश ब्रिटेन की सैर करता हुआ मैं भी करता रहता हूँ.

शराबखोरी और शिष्टाचार


अगस्त का महीना था और मौसम गर्म था। हालांकि भारतीय गर्मियों की तुलना में वह शायद वसंत ऋतु का मौसम ही लगे, मगर कड़क सर्दी के आदी अंग्रेज़ों के लिये वह गर्मी ही थी। इंग्लॅन्ड में उन दिनो गर्मियों का मौसम वैसे भी उतना गर्म नहीं हुआ करता था जितना आजकल होने लगा है। शायद यह ग्लोबल वॉरमिंग का ही असर है कि आजकल कभी गर्मियों में लन्दन दिल्ली से अधिक गर्म हो जाता है, तो कभी सर्दियों में दिल्ली लन्दन से अधिक सर्द।
लन्दन में वह मेरा काम का पहला दिन था। हमारी कंपनी के क्लाइंट यानि कि लन्दन इलेक्ट्रिसिटी के दफ्तर में मैं लंच करके बैठा ही था कि मेरे सामने वाली डेस्क से काले सूट में सजे स्मार्ट और लम्बे गोरे व्यक्ति ने अपनी टाई ढीली करते हुए आवाज़ लगाई, "एनी वन वांट्स आइस्क्रीम?"
मैने झटपट अपना हाथ उपर कर दिया। गर्मी की दोपहर में लंच के बाद आइस्क्रीम से बेहतर और क्या हो सकता था.
"विच फ्लेवर?"
मुझे पता न था कि लन्दन में किन-किन फ्लेवर की आइस्क्रीम मिला करती थीं। परंपरागत चॉक्लेट या वनीला फ्लेवर मुझे कुछ खास पसंद नहीं हैं, सो मैने कुछ सोचते हुए कहा, "मैंगो"
लगभग आधे घंटे बाद वह व्यक्ति पसीने से भीगते हुए आया और मुस्कुराते हुए मेरे सामने मैंगो कुल्फ़ी का एक कुल्हड़ रखा।
"इतनी देर कहाँ लग गई?" मैने बेतकल्लुफी से पूछा।
"कुछ ख़ास नहीं, बस पांच दुकाने ढूंढनी पड़ीं पर मैंगो आइसक्रीम मिल गई" उसने हंसते हुए कहा।
कुछ दिनों बाद पता चला कि वह व्यक्ति लन्दन इलेक्ट्रिसिटी का कोई डाइरेक्टर था। अंग्रेज़ी शिष्टाचार से यह मेरा पहला परिचय था।
पियक्कड़, दुराचारी, पर बड़े शिष्टाचारी। एक आम भारतीय अंग्रेज़ों के बारे में यह राय बड़ी सहजता से बना सकता है। हालांकि परंपरागत भारतीय दृष्टिकोण जिसे दुराचार या चरित्रहीनता समझता है, आधुनिक भारतीय नज़रिया उसे खुलेपन के रूप में देखता है। मगर अंग्रेज़ों के पियककड़पन और शिष्टाचार पर कोई दो राय नहीं हो सकतीं। अंग्रेज़ों के पियककड़पन के नमूने आपको लन्दन पहुंचते ही मिल जाएंगे। लन्दन की सड़कों पर घूमते हुए आपको किसी किनारे 'चेंज, चेंज' की आवाज़ लगाता कोई भिखारी बैठा मिल जाएगा। किसी गोरे भिखारी को एक पौंड का सिक्का भीख में देकर शायद आप दो सौ वर्षों के खोए हुए भारतीय अभिमान को पुनः अर्जित करने की कोशिश भी करेंगे। मगर आपके चेहरे का सारा अभिमान तब जाता रहेगा जब आप देखेंगे कि वह गोरा भिखारी उस सिक्के को लेकर पास की दुकान में जाएगा और हाथ में बियर का एक कैन लिए बाहर निकलेगा।
शराब की दीवानगी के मामले में अंग्रेज़ मिर्ज़ा ग़ालिब को भी मात दे दें। मेरे एक अंग्रेज़ मित्र जॉर्ज स्मिथ के शब्दों में, "वी वर्क टू ड्रिंक एंड ड्रिंक टू वर्क"
शराब को लेकर अंग्रेज़ों की सोच भी नायाब है। एक बार बिर्मिंघम शहर के एजबेस्टन क्रिकेट मैदान में भारत और इंग्लैंड के बीच एक दिवसीय क्रिकेट मैच चल रहा था। मैं अपने कुछ भारतीय और अँगरेज़ मित्रों के साथ दर्शक दीर्घा में मौजूद था। सुबह से ही अंग्रेज़ मित्र एक के बाद एक बियर के गिलास अपने भीतर उड़ेलने में लगे थे, कुछ इस तरह जैसे कि हम किसी क्रिकेट स्टेडियम में नहीं बल्कि बियर पीने की किसी स्पर्धा में बैठे हों। उनकी संगति में दो तीन गिलास बियर मैं भी पी चुका था। हाफ टाइम तक भूख ज़ोरों से लग आई थी। हाफ टाइम होते ही हम स्टेडियम में बने रेस्टोरेंट की ओर लपके और मैंने तुरंत ही एक चिकन बर्गर आर्डर किया। मेरे साथ ही खड़े अंग्रेज़ साथी जॉन ने एक बियर आर्डर की। मैंने आश्चर्य से जॉन की ओर देखते हुए पूछा, "तुम खाना नहीं खाओगे?"
जॉन ने मुस्कुराते हुए कहा, "पांच पौंड का एक बर्गर? इतने में तो दो बियर आ जाएंगी"
शराब की दीवानगी ने कई प्रतिभावान और विख्यात अंग्रेज़ों के व्यावसायिक और विवाहित जीवन भी तबाह किये हैं। मशहूर फिल्म अभिनेत्री एलिज़ाबेथ टेलर और उनके पांचवे पति और प्रसिद्द अभिनेता रिचर्ड बर्टन धुरंधर पियक्कड़ थे। कौन उन्नीस था और कौन बीस यह कहना तो मुश्किल है, मगर उनके कुछ अभिन्न मित्रों की मानें तो एलिज़ाबेथ टेलर शराब पीने की प्रतिस्पर्धा में किसी भी मर्द को हरा सकने का माद्दा रखती थीं। एक बार किसी होटल में शराब पीते हुए एलिज़ाबेथ और रिचर्ड के बीच ज़बरदस्त झगड़ा हुआ। झगडे के दौरान एलिज़ाबेथ हाथ में वोदका की टूटी बोतल लिए रिचर्ड को पूरे होटल में दौड़ाती रहीं। होटल को हुए नुकसान का खर्च आया बीस हज़ार पौंड।
प्रसिद्द अभिनेता रिचर्ड हैरिस भी ज़बरदस्त पियक्कड़ थे। रिचर्ड हैरिस रिचर्ड बर्टन के अच्छे मित्र भी थे। रिचर्ड हैरिस दिन में वोदका की दो बोतल आराम से पी जाते और फिर शाम को ब्रांडी की बोतल खोल कर बैठ जाते। रिचर्ड हैरिस का कहना था कि उन्हें सुबह अख़बार में यह पढ़ने में बड़ा मज़ा आता था कि पिछली रात उन्होंने शराब के नशे में धुत्त होकर क्या-क्या कारनामे किये थे।
एक अन्य अभिनेता ओलिवर रीड तो और भी बड़े पियक्कड़ थे। एक बार उन्होंने एक दिन में बियर के 126 पाइंट पी डाले। ओलिवर रीड की पसंदीदा ड्रिंक उनकी खुद की इज़ाद की हुई थी, एक आइस बकेट में बार में उपलब्ध सभी प्रकार की शराबों को उड़ेल कर बनाई हुई।
ओलिवर कभी-कभी शराब के नशे में धुत्त होकर सांसारिकता से भी परे हो जाते और सरेआम वस्त्र त्याग कर दिगंबर हो जाते। एक बार एक रेडियो चैट शो में अमेरिकी अभिनेत्री इलेन स्ट्रिच के साथ ओलिवर को भी भाग लेना था। इलेन शो पर पहले से ही मौजूद थीं। थोड़ी देर बाद स्टूडियो का दरवाज़ा एक ज़ोर के झटके से खुला और दरवाज़े पर खड़े दिखाई दिए ओलिवर रीड, शराब के नशे में धुत्त और बिलकुल दिगंबर।
"माय डिअर ओलिवर, सच कहूँ तो मैंने बड़े और बेहतर देखे हैं" इलेन ने ओलिवर को घूरते हुए कहा।
शराब के नशे में अँगरेज़ चाहे जैसा भी व्यवहार करें मगर जब वे नशे में न हों तो उनसा विनम्र और शिष्टाचारी भी नहीं मिल सकता। सॉरी, थैंक यू और यू आर वेलकम जैसे शब्द तो उनके मुंह से किसी मीठे झरने से बहते रहते हैं। यदि सड़क चलते आप किसी को ठोकर मार बैठें या किसी के पैर पर आपका जूता आ जाए और वह व्यक्ति पलट के आपसे कहे, "सॉरी" तो समझ लें आप ब्रिटेन के अलावा कहीं और नहीं हो सकते।
शुरू-शुरू में तो मुझे अंग्रेज़ों का यह शिष्टाचार बड़ा ही अटपटा लगता। यदि किसी का काम करके उसे फ़ोन पर उसकी जानकारी दी तो दूसरी ओर से थैंक यू और चियर्स जैसे शब्दों की झड़ी लग जाती। आभार व्यक्त करने का यह तरीका मुझे बड़ा ही विचित्र लगता। ठीक है भाई एक बार थैंक यू कह दिया अब रखो फ़ोन और काम पर लगो। मगर वह तो इस तरह आभार व्यक्त करेगा कि आप उस आभार के आभार तले दबा महसूस करने लगें। और यदि आपको यह न पता हो कि थैंक यू का जवाब यू आर वेलकम होता है थैंक यू नहीं, तो फिर अगले आधे घंटे तक आप एक दूसरे को थैंक यू ही कहते रहेंगे।
ब्रिटेन में सोलह वर्ष रहने के बाद भी मैं अक्सर इन शिष्टाचार की परम्पराओं को लेकर कंफ्यूज हो जाता हूँ। कभी-कभी राह चलते हुए किसी का पैर मेरे पैर पर पड़ जाए तो दर्द से कराहते हुए कह बैठता हूँ, 'यू आर वेलकम'
ब्रिटेन में शिष्टाचार की एक और परंपरा है, 'होल्ड द डोर'. किसी दरवाज़े से गुज़रते हुए अंग्रेज़ व्यक्ति खुले हुए दरवाज़े को उसके पीछे आने वाले व्यक्तियों के लिए पकड़ कर रखता है, तब तक, जब तक कि उसके पीछे आने वाला व्यक्ति दरवाज़े को न थाम ले। मगर शिष्टाचार की हद तो यह है कि यदि उसकी नज़र में काफी दूर से भी कोई व्यक्ति उस ओर आता दिखाई दे तो वह दरवाज़ा पकडे खड़ा रहेगा, कुछ इस तरह कि आने वाले व्यक्ति को ही शर्म आ जाए और उसे आराम से चलने की बजाय दौड़ कर दरवाज़े तक पहुंचना पड़े। कभी कभी तो दृश्य और भी मज़ेदार हो जाता है जब पता चलता है कि आने वाले व्यक्ति को तो उस दरवाज़े से प्रवेश ही नहीं करना था।
दरवाज़ा पकड़ कर खड़े व्यक्ति की आने वाले से इतनी अपेक्षा तो होती ही है कि वह कम से कम उसे थैंक यू कहे। मगर यदि वह अंग्रेजी शिष्टाचार से वाकिफ न हो और थैंक यू न कहे तो दरवाज़ा पकड़े खड़ा व्यक्ति पहले तो उसे तिरिस्कार से देखेगा मगर फिर कहेगा, "यू आर वेलकम"
चलते-चलते बस इतना ही कि यदि आपके बच्चों में शिष्टाचार की कमी हो और आप उन्हें शिष्टाचार सिखाते सिखाते तंग आ चुके हों तो उन्हें ब्रिटेन अवश्य भेजें। यकीन मानिये आपके बच्चे लौट कर आपसे अवश्य कहेंगे, "थैंक यू"

अथ करी कथा


वह लन्दन में मेरी पहली शाम थी। हौलबोर्न इलाके के जिस सर्विस अपार्टमेंट में मैं ठहरा था उसमें हमारी कम्पनी के कई और लोग भी ठहरे हुए थे। पहले ही दिन उन सबसे अच्छी मित्रता हो गई। शाम ढलते ही हमने निर्णय किया कि उस रात हम पश्चिमी खाना न खाकर भारतीय खाना ही खायेंगे। एयरफ्रांस की फ्लाइट में मिले बेज़ायकेदार खाने से जिस तरह मुंह का स्वाद बिगड़ा था, मैं कोई रिस्क भी नहीं लेना चाहता था। सभी साथी मिलकर किसी अच्छे इंडियन रेस्टोरेंट की तलाश में निकल पड़े।
लन्दन में इंडियन रेस्टोरेंट ढूँढना मुश्किल नहीं है। तकरीबन हर दूसरी या तीसरी सड़क पर एक रेस्टोरेंट मिल ही जाता है। थोड़ी दूर चल कर ग्रेट क्वीन स्ट्रीट पहुँचते ही हमारी नज़र 'भट्टी इंडियन क्विज़ीन' पर पड़ी। भट्टी नाम ने ही घर की पंजाबी रसोई की याद ताज़ा कर दी। भूख ज़ोरों से लगी थी और पंजाबी रसोई का ख़याल आते ही मुंह में पानी भी अच्छा-खासा भर आया। हम लपक कर रेस्टोरेंट के भीतर घुसे।
रेस्टोरेंट के मालिक, भट्टी साहब लगभग पचास वर्ष के काफी सज्जन से दिखने वाले सिख पुरुष थे। उन्होने पंजाबी आत्मीयता से हमारा स्वागत किया। जब हमने उन्हे यह बताया कि हम हाल-फिलहाल में ही भारत से आए हुए हैं तो उनकी आत्मीयता और भी बढ़ गई। हमारी बात-चीत भी फॉर्मल से इनफॉर्मल हो गई और एक छोटा सा मज़ाक भी उन्होने मेरी इकहरी काया पर कर डाला। बात-चीत के दौरान जब हमने उन्हे यह बताया कि हम किसी आईटी प्रॉजेक्ट पर लन्दन आए हुए हैं और कुछ महीने यहाँ ठहरने वाले हैं तो उन्होने तुरंत ही एक अधिकारपूर्ण सलाह दे डाली, "लन्दन बहुत महंगा शहर है। आज तो ठीक है मगर कल से खुद ही खाना बनाने का इंतज़ाम कर लो। इस तरह होटलों में खाकर अपना पैसा बर्बाद मत करो" (वैसे ब्रिटेन में रेस्टोरेंट को होटल नहीं कहा जाता। रेस्टोरेन्ट को होटल कहने की परंपरा शायद भारतीय उपमहाद्वीप में ही है) । भट्टी साहब की इस सलाह पर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। शोले फिल्म का वह डायलॉग याद आ गया कि घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो खायेगा क्या? मगर कुछ समय ब्रिटेन में रहने के बाद यह महसूस हुआ कि भट्टी साहब कोई अपवाद नहीं थे। ग्राहकों को उचित सलाह देना ब्रिटिश बिज़नेस एथिक्स का एक अंग है। यह अलग बात है कि भट्टी साहब की सलाह में भारतीय आत्मीयता और अधिकार भी मिले हुए थे।
रेस्टोरेन्ट के भीतर माहौल खुशनुमा था। एक ओर भारतीय व्यंजनों की सुगंध हवा में बिखरी हुई थी और दूसरी ओर वाइन या ठंडी बियर के गिलास थामे एक दूसरे की आँखों में आँखें डाले बैठे कई प्रेमी-युगल माहौल को थोड़ा सा रूमानी भी बना रहे थे। उसी वक्त मैने गौर किया कि बॅकग्राउंड में जगजीत सिंह की गाई यह ग़ज़ल भी बज रही थी, 'झूम के जब रिंदों ने पिला दी, शेख़ ने चुपके-चुपके दुआ दी'। लम्बे सफर की थकान उतारने के लिये जैसा वातावरण सोच रखा था, वैसा ही मौजूद था, 'जैसा था ख्वाब वैसी थी ताबीर हू-ब-हू'।
वेटर ने लाकर सामने मेनूकार्ड रखे और मैं झटपट एक मेनूकार्ड उठाकर उसमें अपनी पसंदीदा डिशें ढूंढने लगा। मगर उसमें लिखी कई डिशों के नामों ने मुझे उलझन में डाल दिया। बाल्टी, जालफ्रेज़ी, विंडलू, फ़ाल, धनसक जैसे व्यंजनों के नाम मैने पंजाब तो क्या उत्तर या मध्य भारत में कहीं नहीं सुने थे। मैने अंदाज़ लगाया कि वे शायद भारत के उन हिस्सों से होंगे जहाँ जाने का अवसर मुझे तब तक नहीं मिला था। मेनूकार्ड की डिशों में जो डिशें मुझे ठीकठाक लगीं उनमें एक थी, 'चिकन टिक्का मसाला'। अंदाज़ लगाना आसान था कि वह 'चिकन टिक्का' को तीखे मसालों में मिला कर बनाई गई कोई डिश होगी। हालांकि कुछ समय बाद पता चला कि 'चिकन टिक्का मसाला' ब्रिटेन में ईज़ाद की गई एक थोड़ी माइल्ड और क्रीमी डिश थी जिसे कुछ सालों बाद सन 2001 में ब्रिटेन की नेशनल डिश भी घोषित किया गया था।
खैर खाना लज़ीज़ था और ठंडी किंगफिशर बियर के साथ हमने उसका लुत्फ भी खूब लिया। साथ ही आसपास बैठे गोरे व्यक्तियों को मसालेदार भारतीय व्यंजनों को चटकारे मार कर खाते देख ब्रिटेन की 'करी कल्चर' में उत्सुकता भी काफी बढ़ी। बस फिर मैं झटपट ब्रिटेन की करी कल्चर पर जानकारियां इक्कठी करने लगा।
भारतीय भोजन का ब्रिटेन पर असर तभी होने लगा था जब अंग्रेज़ों ने भारत में पहला कदम रखा। ठंडे और रूखे पश्चिमी युरोप से आए अंग्रेज़ों को भारतीय संस्कृति की चमक बहुत भाई। फिर चाहे वे रंग-बिरंगे चटकीले कपड़े हों या मसालेदार चटखरे व्यंजन, सभी कुछ भारतीय उन्हें लुभाने लगा। प्रसिद्ध लेखक विलियम डारलिम्पल ने अपने उपन्यास 'वाइट मुग़ल' में बड़ी खूसूरती से वर्णन किया है कि किस आतुरता से 18 वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज़ मुलाज़िम भारतीयता अपनाने लगे थे। उनमें से कुछ तो इतने भारतीय हो गए कि वे अपने ही देश इंग्लैंड को विदेश या विलायत कहने लगे। यही विलायत बाद में जाकर विलायती और फिर ब्लाइटी हो कर ब्रिटेन और इंग्लैंड के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला एक पॉपुलर स्लॅंग बन गया। भारत से ब्रिटेन लौटने वाला ब्रिटिश सिपाही कहता 'आई एम बॅक टू ब्लाइटी' (मैं वापस ब्लाइटी या विदेश आ चुका हूँ). आज भी जब कोई अंग्रेज़ विदेश होकर वापस इंग्लैंड लौटता है यही कहता है, 'बॅक टू ब्लाइटी'।
खैर वापस 18 वीं शताब्दी में चलें। ईस्ट इंडिया कम्पनी के अंग्रेज़ मुलाज़िम जब ब्रिटेन लौटते तो अपने साथ भारतीय रंगों की चमक और मसालों की महक लेकर लौटते। हालांकि पश्चिमी देशों का एशियाई मसालों से परिचय कई सदियों पहले ही हो चुका था। कहते हैं कि एशिया के ढेरों मसाले तो युरोप के वे ईसाई योद्धा ला चुके थे जो अरब और तुर्क मुसलमानों के खिलाफ क्रुसेड लड़ने गए थे। फिर भी ब्रिटेन में भारतीय खाने की लोकप्रियता उन्हीं अंग्रेज़ों ने बढ़ाई जो ईस्ट इंडिया कंपनी में काम करके ब्रिटेन लौटे थे। भारतीय भोजन की लोकप्रियता ब्रिटेन में कुछ ऐसी बढ़ी कि ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया तक ने अपने महल में कुछ ऐसे रसोईए रखे जो स्वयं उनके लिये रोज़ भारतीय व्यंजन बनाते, जिन्हे वे बड़े चाव से खातीं और अपने मेहमानों को भी खिलातीं। उन दिनों जिस दावत में हिंदुस्तानी करी न होती उसे अधूरा ही माना जाता।
ईस्ट इंडिया कंपनी के ही दो कर्मचारियों के पुत्र थे विलियम मेकपीस थॅकरे। विलियम कलकत्ता में पैदा हुए थे और भारतीय भोजन से उन्हे खास लगाव था। विलियम के प्रसिद्ध उपन्यास 'वॅनिटी फेयर' में हिन्दुस्तानी करी से जुड़ा एक मज़ेदार दृश्य है। उपन्यास की नायिका एमीलिया सॅड्ली के पिता मिस्टर सॅड्ली उपन्यास की खलनायिका रेबेका शार्प का किसी दावत में भारतीय करी से परिचय कराते हैं,
"लीजिये मिस शार्प हिन्दुस्तानी करी चखकर देखिये"
रेबेका ने उससे पहले कभी करी नहीं चखी थी।
"कैसी लगी? क्या यह उतनी ही लाजवाब है जितनी और सभी भारतीय चीज़ें होती हैं?" मि. सॅड्ली ने हंसते हुए पूछा।
"ओह एक्सलॅंट" रेबेका ने मुश्किल से कहा। उसका मुंह करी के तेज़ मसालों से जल रहा था।
"इसके साथ थोड़ी चिली (मिर्च) ट्राइ करिये" मि. सॅड्ली ने मज़ा लेते हुए हुए कहा।
"चिली!! ऑफ कोर्स" चिली नाम से रेबेका ने सोचा कि वह कोई चिल या ठंडा करने वाली चीज़ होगी, और लपकते हुए एक पूरी हरी मिर्च अपने मुंह में डाल ली।
1809 में भारतीय व्यवसाई दीन मोहम्मद ने 'हिन्दुस्तानी कॉफी हाउस' नाम से लन्दन में ब्रिटेन का पहला भारतीय रेस्टोरेंट खोला जहां भारतीय व्यंजनों के साथ ही हुक्का गुड़गुड़ाने का भी पूरा इंतज़ाम था। मगर भारतीय खाने की लोकप्रियता और हुक्के की मौजूदगी के बावज़ूद यह रेस्टोरेंट नहीं चला और तीन वर्षों के अंदर ही दीन मोहम्मद ने बॅंकरप्सी का आवेदन दे डाला। वजह थी इंग्लेंड की कड़क ठंड। कड़क ठंड की वजह से उन दिनों इंग्लैंड में 'ईट आउट' का वैसा कल्चर नहीं था जैसा कि आजकल है।
19वीं और 20वीं शताब्दी में भी हिन्दुस्तानी करी ब्रिटेन में लोकप्रिय बनी रही। मगर जिस तरह आज हम ब्रिटेन की गली-गली में इंडियन रेस्टोरेंट और हर ज़ुबान पर चिकन टिक्का या विंडलू जैसे नाम सुनते हैं वह 1971 तक न हुआ था। 1971 के भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश बनने के दौरान एक बड़ी तादाद में बांग्लादेशी शरणार्थी ब्रिटेन आए। उनमें से अधिकांश लन्दन के ईस्ट एंड इलाके में बसे और वहीं से उन्होने छोटे-छोटे इंडियन रेस्टोरेंट खोलने का सिलसिला शुरू किया। आज भी ब्रिटेन के लगभग 70% इंडियन रेस्टोरेंट बांग्लादेशियों के ही हैं।
इसके बाद तो भारतीय करी जैसे ब्रिटिश संस्कृति का एक अभिन्न अंग ही बन गई। इतना ही नहीं करी संस्कृति और करी उद्योग में ब्रिटेन ने अपनी खुद की अलग पहचान भी बना ली। मज़े की बात यह कि विश्व के कुछ हिस्सों में तो करी को भारतीय नहीं बल्कि ब्रिटिश व्यंजन समझा जाता है। विश्व के विभिन्न देशों में जो करी डिशें बड़े बड़े होटलों के मेनूकार्ड में दिखाई देती हैं उनमें से कई डिशें तो ब्रिटेन में ईज़ाद की हुई हैं, जैसे कि बाल्टी, जालफ्रेजी, चिकन टिक्का मसाला और फाल। बाल्टी डिश ब्रिटिश पाकिस्तानियों द्वारा ईजाद की हुई है. यह कुछ-कुछ कड़ाही डिश जैसी होती है और तेज़ आंच पर बनाई जाती है। कहते हैं कि इसका नाम बाल्टी इसलिए पड़ा कि जिस बर्तन में यह परोसी जाती थी वह बकेट या बाल्टी जैसा दीखता था। एक अन्य मान्यता यह भी है कि इसका नाम उत्तरी पाकिस्तान के इलाके बाल्टिस्तान के नाम पर पड़ा है।
जालफ्रेज़ी बंगालियों की ईज़ाद की हुई डिश है। यह हरी मिर्च और पेपर यानि शिमला मिर्च मिलाकर बनाई जाने वाली तीखी डिश है। इसका नाम 'जालफ्रेज़ी' दो शब्दों से मिलकर बना है, बंगाली शब्द 'झाल' जिसका अर्थ होता है तीखा और उर्दू शब्द 'परहेज़'। यानि कि ऐसी तीखी डिश जिससे परहेज़ ही किया जाए तो बेहतर है। हालांकि अब जालफ्रेज़ी ब्रिटेन की सबसे पॉपुलर डिश बन चुकी है। पिछले डेढ़ दशकों में जिस तरह अंग्रेज़ों की रूचि 'चिकन टिक्का मसाला' जैसी थोड़ी माइल्ड और क्रीमी डिश से जालफ्रेज़ी जैसी तीखी डिश की ओर बढ़ी है उससे पता चलता है कि अंगेज़ी जिव्हा को अब तीखे स्वाद की आदत हो चुकी है।
हालाँकि ऐसा नहीं है कि अंग्रेज़ों को तीखे व्यंजन पहले पसंद नहीं थे। विंडलू और फाल जैसी बेहद तीखी डिशें ब्रिटेन में काफी पॉपुलर रही हैं। विंडलू गोवा की डिश है जो सिरका, लाल मिर्च और लहसुन मिलाकर बनाई जाती है। यह डिश पुर्तगालियों द्वारा गोवा लाई गई थी। यह करी खासतौर पर उन युवा छात्रों के बीच बहुत लोकप्रिय है जो शाम को पबों में ठंडी-ठंडी बियर पीने के बाद कोई तीखा व्यंजन खाना पसंद करते हैं। कुछ समय पहले ब्रिटेन में किये गए एक सर्वे में पुरुषों से पूछा गया कि ठंडी बियर के बाद वे क्या अधिक पसंद करेंगे, 'ए हॉट वुमन' या 'ए हॉट करी'? अधिकांश का उत्तर था, 'ए हॉट करी'!!
खैर विंडलू की लोकप्रियता का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि फ्रांस में हुए 1998 के फुटबॉल वर्ल्डकप के लिये इंग्लैंड का वर्ल्डकप सौंग विंडलू पर आधारित था। प्रसिद्ध ब्रिटिश बैंड 'फैट लेस' द्वारा बनाया गया यह गीत इतना लोकप्रिय हुआ कि 1998 में यूके सिंगल्स चार्ट में यह दूसरी पायदान तक पहुंच गया। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं-
"मी एंड मी मम एंड मी डैड एंड मी ग्रैन,
वी आर ऑफ टू वॉटरलू,
मी एंड मी मम एंड मी डैड एंड मी ग्रैन,
एंड ए बकेट ऑफ विंडलू,
विंडलू, विंडलू, नाह, नाह, नाह...
विंडलू, विंडलू, वी ऑल लाइक विंडलू,
वी आर इंग्लेंड एंड वी आर गोना स्कोर वन मोर दैन यू"
वॉटरलू वह जगह है जहाँ इंग्लैंड ने फ्राँसीसी योद्धा नेपोलियन के खिलाफ वॉटरलू की प्रसिद्ध ऐतिहासिक लड़ाई जीती थी। यानि इस गीत का थीम यह है कि विंडलू की बकेट लिये हम वॉटरलू की लड़ाई की तरह ही फ्रांस की ओर विजय यात्रा पर निकले हैं।
'फाल' शायद विश्व की हॉटेस्ट करी है, जिसकी ईज़ाद ब्रिटेन के बिर्मिंघम शहर में हुई है। ब्रिटेन के कुछ रेस्टोरेंट तो इतनी हॉट फाल बनाते हैं कि यह शर्त रखी जाती है, जो भी फाल की पूरी प्लेट खत्म कर देगा उससे करी का पैसा नहीं लिया जाएगा। पिछले साल अमेरिका के मॅनहेटेन इलाके में ब्रिटिश थीम पर बने एक रेस्टोरेंट ने विश्व की सबसे हॉट फाल करी बनाई। यह करी आसाम की 'भूत नागा जोलोकिया' मिर्च से बनाई गई जिसका इस्तेमाल आंसूगैस बनाने में होता है। कहते हैं कि इस करी को बनाते समय शेफ ने गैसमास्क पहना हुआ था और इसे खाने वाले ग्राहक उल्टी करते हुए और चीखते हुए पाए गए। उनमें से दो को तो अम्बुलेंस में डालकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा। यह करी आज भी 'ब्रिकलेन करी हाउस' नामक इस रेस्टोरेंट में उपलब्ध है। इस करी के साथ यह शर्त भी है कि जो भी करी की पूरी प्लेट खत्म करेगा उसे एक फ्री बियर दी जाएगी और उसका नाम रेस्टोरेंट के 'फाल ऑफ फेम' में दर्ज़ किया जाएगा। यदि आप एक भारतीय होने के नाते 'भूत जोलोकिया' जैसी मिर्च को चख सकने की सहनशक्ति रखते हैं तो मॅनहेटेन जाएँ और 'फाल ऑफ फेम' में अपना नाम दर्ज़ कराएं। वैसे खबर है कि ब्रिटेन में भूत जोलोकिया को मात देने वाली मिर्च पैदा कर ली गई है जिसका नाम है, 'इन्फिनिटी'। अब देखें इन्फिनिटी से बनी करी कब बाज़ार में आती है।