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Sunday, 12 June 2016

आकर्षित करता है थेम्स का पारदर्शी प्रवाह



५ अगस्त १९९८, आज से लगभग अठारह साल पहले लन्दन शहर से मैं पहली बार रूबरू हुआ था. ब्रिटेन की जिस आईटी कम्पनी के लिये मैं दिल्ली में काम किया करता था उसे मेरी सेवाओं की लन्दन में ज़रूरत आ पड़ी थी. दिल्ली के इंदिरा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरकर, पेरिस होते हुए एयरफ्राँस की फ्लाइट समय पर लन्दन पहुंच चुकी थी. दोपहर के लगभग दो बजे होंगे. फ्लाइट में मिले बेज़ायकेदार खाने से मुंह का स्वाद बिगड़ा हुआ था और मूड भी कुछ खराब था. आदत के अनुसार एक जोड़ी बनारसी पान की तलब हो रही थी. हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरते ही सबसे पहले मेरा ध्यान आकर्षित किया कम या तंग कपड़ों में बेतकल्लुफ़ी से सौन्दर्य परोसती युवतियों ने. जितना सौन्दर्य उनके अंगों से छलक रहा था उतना ही उनकी गालों तक खिंची मोहक मुस्कानों से भी. सब की सब लगता था किसी प्रोफेशनल इन्स्टिट्यूट से मुस्कुराने की ट्रेनिंग लेकर आई थीं. भारतीय युवतियाँ अपरिचित युवकों की ओर देखकर मुस्कुराने से अक्सर परहेज़ करती हैं कि कहीं कोई किसी गलतफहमी का शिकार ना हो जाए. अंग्रेज़ी बलाएँ इस मामले में बेहद उदार हैं. गलतफहमियों की परवाह भी शायद उन्हे कम ही रहती हैं. उनकी उदार मुस्कानों से मेरा मिज़ाज कुछ ठीक हुआ. बनारसी बीड़े की तलब भी जाती रही.
हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही मेरा स्वागत किया सूट-बूट और टाई में सजे एक गोरे व्यक्ति ने जो मेरे नाम की तख्ती लिये खड़ा था. उसके रंग-ढंग से मैने अनुमान लगाया कि वह हमारी कम्पनी का कोई एग्ज़िक्युटिव होगा. मेरे सामान की ट्रॉली लिये वह टॅक्सी स्टॅंड की ओर बढ़ा और वहाँ खड़ी काले रंग एक चमचमाती सी-क्लास मर्सेडीज़ का बूट खोल कर उसमें मेरा सामान रखा. टॅक्सी के दाईं ओर का पिछला दरवाज़ा खोल कर उसने बड़े आदर से मुझे अंदर बैठने का आग्रह किया. तब जाकर मुझे समझ आया कि वह एक टॅक्सी ड्राइवर था जिसे हमारी कम्पनी ने मुझे लेने भेजा था. मैने उससे कहा कि मैं सामने की ओर पॅसेंजर सीट पर बैठना पसंद करूंगा. वैसे मर्सेडीस में बैठने का असली मज़ा तो तब है जब आप ड्राइवर सीट पर हों. खैर ड्राइवर सीट न सही उसके बगल वाली ही सही. मारुति 800 के आदी व्यक्ति का सी-क्लास मेर्सेडीज़ में पहली बार बैठने पर शायद वही हाल होता है जो दुर्योधन का पांडवों के इन्द्रप्रस्थ के महल में जाकर हुआ था. सौभाग्य से वहाँ मेरा मज़ाक उड़ाने के लिये कोई द्रौपदी मौजूद नहीं थी.
मुझे लिये टॅक्सी सेंट्रल लन्दन के हौलबोर्न इलाके की ओर बढ़ चली जहां मेरे रहने का इंतज़ाम किया गया था. लन्दन के बारे में मेरी कल्पना थी नमी में लिपटा सांवला आकाश और उससे ढकी गगनचुंबी इमारतें. मेरी कल्पना के विपरीत आकाश साफ़ और उजला था और गगनचुंबी इमारतें नदारत थीं. लन्दन का ट्रैफिक सुव्यवस्थित था. सुव्यवस्थित चीज़ों के बारे में कुछ अधिक कहने को नहीं होता. सब कुछ बस एक सा, एक ही रफ़्तार से चलता रहता है, मानो कहीं कोई एक्साइटमेंट ही न हो। लन्दन के ट्रैफिक का भी वही हाल था. सड़कों के किनारे बने मकान भी लगभग एक से थे और दुकानें भी लगभग एक सी. वही कतार में लगीं एक दूसरे से लगभग सटी दो मंज़िला इमारतें, वही किनारों की ओर ढलकी लाल खप्परों या टाइलों से ढकी छतें, वही छतों से सिर उठाती लाल ईंटों से बनी छोटी-छोटी चिमनियाँ और उन पर बैठे कबूतर. पहली नज़र में लन्दन शहर ने मुझे बेहद निराश किया. मगर जैसे-जैसे हम सेंट्रल लन्दन की ओर बढ़ने लगे शहर का स्वरूप कुछ-कुछ बदलने लगा. विक्टोरियन शैली से लेकर जॉर्जियन, ट्यूडर, गॉथिक, नॉर्मन और एंग्लोसेक्सन होते हुए, रोमन शैली तक के आर्किटेक्चर का सुन्दर मिश्रण दिखाई देने लगा, और साथ ही दिखाई देने लगीं आधुनिक शैली में बनी कुछ गगनचुम्बी इमारतें भी. ऐसा लगा जैसे मेरी निराशा से आहत लन्दन पूरे सामर्थ्य के साथ अपने सौन्दर्य को अनावृत करने पर उतारू था.
थोड़ी देर बाद ही मेरा सामना हुआ उस नदी से जिसकी धारा से कहीं अधिक उसके किनारे जीवंत और गतिशील दिखाई पड़ रहे थे. जी हाँ थेम्स नदी. यूँ तो फ्लाइट के लन्दन में उतरते समय हवाईजहाज की खिड़की से मुझे नागिन की तरह बल खाती थेम्स के दर्शन पहले ही हो चुके थे, मगर किनारों तक लबालब भरी इस नदी को पास से देखने का आनंद कुछ और ही था. खूबसूरत टॉवर ब्रिज के नीचे से लगभग पारदर्शी जल की धारा लिये बहती थेम्स और दिल्ली के निज़ामुद्दीन ब्रिज के नीचे किसी नाले की नियति लिये बहती यमुना नदी के बीच तुलना का विचार मन में तैर आया, जिसे मैने बड़ी मुश्किल से एक ओर सरकाया. तुलना के लायक कोई विशेष समानता मुझे दिखाई न दी सिवाय इसके कि दोनो ही नदियाँ अपने किनारों पर एक लम्बा और महत्वपूर्ण इतिहास लिये बहती हैं. वैसे थेम्स का प्रवाह हमेशा ही ऐसा पारदर्शी न हुआ करता था. कहते हैं कि थेम्स का पानी कभी काफी मटमैला और गहरे धूसर रंग का हुआ करता था. थेम्स के बहुत से हिस्सों में समुद्र की तरह ही ज्वार-भाटे से उठा करते हैं, जो तह की मिट्टी को उपर उठा लाते हैं और पानी की उपरी सतह तक को मटमैला कर देते हैं. यदि इस पानी को साफ़ न किया जाए और उस पर आस-पास की गंदगी और प्रदूषण उसमें उसी तरह आकर मिलते रहें जैसे कि भारत की शहरी नदियों में आकर मिलते रहते हैं तो पानी काफी गहरे रंग का हो सकता है. माना जाता है कि नदी का नाम थेम्स इसके गहरे रंग की वजह से ही पड़ा था. संस्कृत का शब्द 'तमस' जिसका अर्थ हिन्दी में ‘अंधकार’ और अंग्रेज़ी में ‘डार्क’ होता है, वह लेटिन में 'टेमेसिस' और केल्टिक में 'टेमेसस' होते हुए 'टेम्स' हो गया. कुछ शताब्दियों बाद यूनानी असर में टेम्स को थेम्स कहा जाने लगा. यानि कि कहा जा सकता है कि थेम्स नदी को उसका नाम एक तरह से भारत की ही देन है. एक धारणा यह भी है कि लेटिन शब्द ‘टेमेसिस’ दो शब्दों से मिलकर बना है, 'टॅम' अर्थात चौड़ा और 'आइसिस' अर्थात पानी या नदी, यानि कि टेमेसिस का अर्थ हुआ 'चौड़ी नदी'. हालांकि भारतीय नदियों गंगा, यमुना या ब्रह्मपुत्र से तुलना की जाए तो थेम्स किसी दृष्टिकोण से चौड़ी नदी नहीं लगती.
ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के बाद थेम्स पर औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण का वैसा ही असर पड़ा जैसा कि भारत की शहरी नदियों पर इन दिनों देखने मिलता है. सन १८५८ में थेम्स का पानी इतना प्रदूषित और बदबूदार हो गया कि इस दुर्गन्ध के मारे उसके तट पर बनी ब्रिटिश संसद में सांसदों का बैठना दूभर हो गया और ब्रिटिश संसद को कुछ दिनों के लिये स्थगित करना पड़ा. किसी भी राष्‍ट्रीय समस्या का असर जब राजनीतिज्ञों या सांसदों पर पड़े तो उसका हल भी तुरंत ही निकल आता है. ब्रिटिश संसद ने भी तुरंत ही थेम्स के प्रदूषण को दूर करने की सीवर योजना का बिल १८ दिनों के भीतर बना कर पारित भी कर डाला. लन्दन का सीवर सिस्टम विश्व के सर्वाधिक सक्षम सीवर सिस्टम में एक है. शहर की आबादी और प्रदूषण बढ़ने के साथ ही इस सीवर सिस्टम का विस्तार और आधुनिकीकरण भी होता रहा है. कुछ महीनों पहले ही मैं एक ऐसे ही एक्सपांशन प्रोजेक्ट के आईटी डिज़ाइन और आर्किटेक्चर पर थेम्स वाटर कंपनी के लिए काम कर रहा था. चार बिलियन पॉउण्ड यानि कि लगभग चार हज़ार करोड़ रुपए का यह प्रोजेक्ट थेम्स की धारा के सौंदर्य को और निखारने की एक महत्वकांक्षी योजना है. यदि इतिहास में कभी एक बदबूदार नाले का रूप ले चुकी थेम्स आज पानी की एक स्वच्छ और पारदर्शी धारा लिए बह सकती है तो भारत की पवित्र नदियों गंगा और यमुना का इससे अलग किसी और नियति को प्राप्त होना राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से ही है.
हॉलबोर्न में ठहरने के बाद मैं रोज़ शाम को थेम्स के किनारे लम्बी सैर पर निकल पड़ता. कभी पश्चिम में वेस्टमिंस्टर ब्रिज की ओर तो कभी पूर्व में टॉवर ब्रिज की ओर. एक ओर थेम्स की धारा से उठती ठंडी हवा और दूसरी ओर उसके किनारों पर बनी ऐतिहासिक इमारतों का सौंदर्य, जिनमें लम्बवत्त गॉथिक शैली में बना खूबसूरत ‘वेस्टमिन्स्टर पैलेस’ और ताजमहल जैसा गुंबद लिए बना अनूठा ‘सेंट पॉल कैथेड्रल’ जैसी बेमिसाल इमारतें शामिल हैं, हर शाम की यह पैदल सैर मुझे थेम्स के किनारों के जैसी ही सजीवता से भर देती. पूर्व की ओर बढ़ते हुए दूर से ही टॉवर ब्रिज का सौंदर्य मन मोह लेता, खासतौर पर तब जब उसके नीचे से कोई बड़ी बोट गुज़र रही होती. टॉवर ब्रिज कोलकाता के हावड़ा ब्रिज की तरह एक केंटिलीवर ब्रिज है. जब भी उसके नीचे से किसी बड़ी बोट को गुज़रना हो तो ब्रिज के केंटिलीवर उस पर से गुजरने वाले सारे यातायात को रोक कर, ऊपर की ओर उठ जाते हैं. इस दृश्य को अपने कैमरे में कैद करने के लिए ढेरों पर्यटक लम्बे समय तक टॉवर ब्रिज के आसपास खड़े इस अवसर का इंतज़ार करते रहते हैं.
बहुत से लोग आज भी टॉवर ब्रिज को गलती से लन्दन ब्रिज कहते हैं जबकि लन्दन ब्रिज उससे कुछ दूरी पर बना एक अलग ब्रिज है. लन्दन ब्रिज का भी एक अनूठा इतिहास है. यह ब्रिज इतिहास में कई बार बना, टूटा और फिर बना है. संभवतः सबसे पहला ब्रिज रोमन आक्रमणकारियों ने बनाया था जो लकड़ी का बना प्लावी या फ्लोटिंग ब्रिज था. ब्रिटिश सम्राट हेनरी द्वितीय ने सन ११७६ में पहला पक्का ब्रिज बनवाया और उसे अपने मित्र और राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी केंटबरी के आर्चबिशप थॉमस अबेकेट को समर्पित करते हुए ब्रिज पर उसकी याद में एक चैपल भी बनवाया. समय के साथ ब्रिज के दोनों ओर ढेरों अन्य इमारतें बनाई गई जिनमें से कुछ सात मंज़िलों तक ऊँची थीं और ब्रिज के दोनों ओर लगभग सात फुट तक बाहर लटकी हुई थीं. समय-समय पर ये इमारतें आग लगने या अन्य दुर्घटनाओं का शिकार होकर ढहती रहीं और फिर बनती रहीं. प्रसिद्द बालगीत 'लन्दन ब्रिज इस फॉलिंग डाउन … ' इन्हीं टूट और मरम्मतों की कहानी कहता है. ब्रिज के दोनों ओर बनी इमारतों की वजह से यह ब्रिज इतना संकरा हो चुका था कि इस पर से गुजरने वाला ट्रैफिक तंग भारतीय सडकों के ट्रैफिक की तरह ही अव्यवस्थित होकर थम जाता. सड़क पर बाईं ओर ड्राइव करने का नियम इसी ट्रैफिक को व्यवस्थित करने के लिए सन १७२२ में बनाया गया था. सन १८३१ इस ब्रिज को ढहा कर एक चौड़ा और मजबूत ब्रिज बनाया गया जो दुर्भाग्यवश अपने ही भार से धंसता गया. बीसवीं शताब्दी में इस ब्रिज को भी ढहा कर किसी अमेरिकी व्यवसायी को ऊँची कीमत में बेच दिया गया. कहा जाता है कि ब्रिज को खरीदते समय अमेरिकी व्यापारी को भ्रम था कि वह टॉवर ब्रिज खरीद रहा था.
थेम्स के पुलों से जुड़ा एक दुर्भाग्यजनक तथ्य यह भी है कि इन पुलों से गिरकर या कूदकर बहुत से लोग अपनी जाने भी गवाते हैं. लगभग हर हफ्ते थेम्स से एक मानव शव निकाला जाता है. हालाँकि कुछ लोगों की धारणा यह भी है कि इन मृत्युओं का कारण थेम्स में रह रहे कुछ अदृश्य पोलर भालू हैं. सन १२५२ में सम्राट हेनरी तृतीय को नॉर्वे से भेंट में एक पोलर भालू मिला था जिसे वे थेम्स में मछलियाँ पकड़ने के लिए छोड़ दिया करते थे. संभवतः उस पोलर भालू के वंशज आज भी थेम्स में अदृश्य रूप से तैर रहे हैं.
जहाँ भारत में पवित्र नदियों को देवी या माततुल्य माना जाता है वहीँ ब्रिटेन में थेम्स को पितातुल्य मानकर 'फादर थेम्स' कहा जाता है. 'ओल्ड फादर थेम्स' या 'वृद्ध थेम्स देव' थेम्स नदी का मूर्तिमान रूप है जो काफी कुछ यूनानी देवता नेपच्यून की तरह दिखता है. 'ओल्ड फादर थेम्स' की लगभग नग्न मूर्ती टॉवर ब्रिज के पास, उसकी ओर ऊँगली उठा कर इशारा करती हुई टॉवर हिल पर लगी हुई है, जिसे पर्यटक अक्सर नेपच्यून की मूर्ती समझ लेते हैं.
थेम्स से जुड़े रोचक तथ्य, किस्से और मिथक अनेक हैं. आज सोलह वर्ष बाद भी थेम्स मुझे उतना ही आकर्षित और विस्मित करती है जितना उसने मुझे पहली मुलाकात में किया था. आज भी थेम्स के किनारे टहलते हुए मैं उससे जुड़े रोचक किस्से तलाशता रहता हूँ और साथ ही पढता रहता हूँ उस इतिहास को जो उसके किनारे रचा हुआ है. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'द ग्लिम्प्सेस ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री' में कहा है कि इतिहास को सिर्फ किताबों में न पढ़ो, उन्हें ऐतिहासिक इमारतों और उनके अवशेषों में भी देखो. उन्हें गौर से देखो उनमें तुम्हे इतिहास लिखा नज़र आएगा. बस कुछ ऐसी ही कोशिश ब्रिटेन की सैर करता हुआ मैं भी करता रहता हूँ.

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